By पीयूष कुमार

गाँधी संत थे पर जंगल नहीं भागे। दुनिया में रहकर उन्होंने जिस राजनीतिक चेतना का सूत्रपात किया, वह दुर्लभ है। पहले 21 सालों का गांधी इतिहास तो दक्षिण अफ्रीका में है उसे जानिए। 'सत्य के साथ मेरे प्रयोग' पढ़िए। आसानी से गांधी को समझना हो तो 'लगे रहो मुन्नाभाई' फिल्म देखिये।

इंसानी जिंदगी के विरोधों और संघर्षों का उद्देश्य शांति ही है तो क्यों न सीधे शांति, प्रेम और सत्य की राह में ही चला जाये। ऐसे में जब हम वहां पहुंचते हैं तो वहां गाँधी पहले से ही मुस्कुराता खड़ा मिलता है। अब गाँधी व्यक्ति नहीं रह गया है, वह प्रेम, भाईचारे, बंधुत्व, स्वावलंबन, अहिंसा पर आधारित जीवन हो गया है। हम कहीं से भी जाएँ, नेकी की राह पर गाँधी के साथ ही जाना पड़ेगा। यह मानव जाति की मजबूरी है। 'मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी' की  यही परिभाषा है।

हम बहुत सी बुराइयों के दंभ के साथ जीना तो चाहते हैं, पर कोई भावना है जो हमें बार बार इंसानियत की राह पर ला पटकती है। हम मजबूर हैं गाँधी कि तुम हमेशा वहीँ मिल जाते हो...!

नमन महात्मा !