नई दिल्ली भारत में हर साल वायु प्रदूषण से 12 लाख लोगो की मौत के आगोश में चले जाते हैं। हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। जिस तरह से पर्यावरण का स्तर लगातार खराब होता जा रहा है उससे तो यह महज रस्म ही लगता है। स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2019 की रिपोर्ट के अनुसार वायु प्रदूषण से करीब 50 लाख लोगों की मौत हुई।

स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2019 की ओर से जारी रिपोर्ट के अनुसार, भारत में वायु प्रदूषण से मौत का आंकड़ा स्वास्थ्य संबंधी कारणों से होने वाली मौत को लेकर तीसरा सबसे खतरनाक कारण है। देश में सबसे ज्यादा मौतें सड़क हादसों और मलेरिया के कारण होती है।  घर के भीतर या लंबे समय तक बाहरी वायु प्रदूषण से घिरे रहने की वजह से 2017 में स्ट्रोक, शुगर, हर्ट अटैक, फेफड़े के कैंसर या फेफड़े की पुरानी बीमारियों के कारण वैश्विक स्तर पर करीब 50 लाख लोगों की मौत हुई।

यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो की एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट के अनुसार अगर धरती पर वायु प्रदूषण के स्तर पर सुधार आ जाए तो वैश्विक स्तर पर हर शख्स की उम्र में 2.6 साल बढ़ सकती है। भारत और चीन की बात करें तो वायु प्रदूषण से बेहाल चीन ने इस पर लगाम कसने के लिए कई बड़े फैसले लिए है। धुआं निकालने वाले कारखानों और वाहनों के इस्तेमाल पर रोक लगाई, जिससे कुछ हद तक कुछ हद तक सुधार आयें है। 

अब भारत की बात करें, तो यहां पर राजधानी दिल्ली समेत कई शहरों में वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर को भी पार कर गया है। भारत में जीवन-प्रत्याशा (लाइफ एक्सपेक्टेंसी) में 5.3 साल की कमी आई है। दिल्ली से सटे 2 शहरों (हापुड़ और बुलंदशहर) की बात करें तो यहां पर जीवन-प्रत्याशा की दर में निराशाजनक कमी आई है और यहां पर 12 साल से भी ज्यादा कम हो गई है, जो दुनिया में किसी भी शहर की तुलना में सबसे ज्यादा है।

2017 में 50 लाख लोगों की मौत

ग्लोबल बर्डन ऑफ डिसीज के अनुसार, 2017 में प्रति 1 लाख की आबादी में वायु प्रदूषण के कारण सबसे ज्यादा मौत (65.85) के लिए प्रदूषण के 3 कारक ज्यादा जिम्मेदार रहे। सबसे ज्यादा मौत (38.15) आउटडोर प्रदूषण यानी चिमनी, वाहनों और आग से निकलने वाले धुएं से फैले प्रदूषण के कारण हुई। इसके बाद घर से निकलने वाले प्रदूषण (21.47) और ओजेन क्षरण (6.23) के कारण सबसे ज्यादा मौतें हुईं।