By यशवंत गोहिल



 

चलिए, लोकसभा चुनाव से पहले विवाद या बखेड़ा खड़ा करने के लिए एक और मौका कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही को मिल गया है। अनुपम खेर अभिनित द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर फिल्म जनवरी में रिलीज़ होने वाली है। ऐसे वक्त में जब पांच महीने में आम चुनाव होने वाले हैं। इसका ट्रेलर रिलीज़ कर दिया गया  है।

सवाल ये है कि एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर पर राजनीतिक उबाल क्यों शुरू हो रहा है?

महाराष्ट्र में युवक कांग्रेस ने ताक़ीद की है कि अगर उन्हें दिखाए बिना फिल्म रिलीज की गई, तो फिल्म नहीं चलने दी जाएगी। आख़िर ऐसा क्या है इसमें? इससे पहले भी भारतीय सिनेमाघरों में फिल्मों के प्रदर्शन को लेकर इस तरह की नौटंकियां चलती रही हैं। जिस वक़्त किताबों का दौर था और है भी, तब किताबों के रचनाकारों का विरोध होता था, अब लोग तो क़िताबों से दूर हो गए, इस कारण शायद उसका उतना विरोध नहीं हुआ, जितना फ़िल्म पर। आख़िरकार फ़िल्म तो संजय बारू की किताब पर ही बनी है। संजय बारू ने किताब 2014 में लिखी थी, उस वक़्त विरोध के स्वर ऐसे मुख़र नहीं थे, जैसा कि अभी सुनाई देने लगा है। दरअसल, भारत में कहीं न कहीं वह हर चीज़ राजनीति से जुड़ती है, जहां भीड़, समूह या  समुदाय होता है। जिस वक़्त संजय बारू की किताब आई, तब वह भीड़, समूह या समुदाय का हिस्सा नहीं बन पाई थी, इसलिए राजनीति से थोड़ी अछूती रही, थोड़ी बहुत बहस जरूर हुई उस वक्त।

अब जब आम चुनाव होने वाले हैें, ऐसे में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर बनीं फिल्म जरूर लोगों को अपनी तरफ खींचेगी और ट्रेलर में जिस तरह के संवाद दिखाई दे रहे हैं, उससे कहीं न कहीं यह साबित हो रहा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बेहद कमज़ोर प्रधानमंत्री थे और सत्ता के दो केंद्र थे, जिनमें गांधी परिवार ज्यादा हावी था। अगर, चुनाव से पहले ऐसी तस्वीर जनमानस के भीतर फिर से उकेरी जाएगी, तो निश्चित ही थोड़ा बहुत असर तो चुनावी मानसिकता पर पड़ेगा ही, चुनावों में मुद्दों से भटकने के लिए एक बड़ा कारण भी होगा। भाजपा पिछले पांच साल की उपलब्धियों या नाकामियों पर बात करने की बजाय इस विषय पर ज्यादा बात करती नज़र आएगी। ऐसे में ग़ौर करना होगा कि वास्तव में इस फिल्म में ऐसा क्या हो सकता है, जिससे कांग्रेस को आपत्ति हो सकती है। 

फ़िल्म संजय बारू की किताब द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टरः द मेकिंग एंड अनमेकिंग ऑफ मनमोहन सिंह पर आधारित है। पहले यह जान लें कि आख़िर संजय बारू कौन हैं? संजय बारू साल 2004 से 2008 के बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार थे। उन्होंने अपने इन्हीं चार साल के अनुभवों को किताब की शक्ल दी थी, जो 2014 में आई थी। उस वक्त बड़ा राजनीतिक हंगामा मचा था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टरः द मेकिंग एंड अनमेकिंग ऑफ़ मनमोहन सिंह' में संजय बारू ने दावा किया था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री सिंह ने उनसे कहा, "किसी सरकार में सत्ता के दो केंद्र नहीं हो सकते. इससे गड़बड़ी फैलती है। मुझे मानना पड़ेगा कि पार्टी अध्यक्ष सत्ता का केंद्र हैं। सरकार पार्टी के प्रति जवाबदेह है।"

बीबीसी ने एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें बताया गया है कि संजय बारू ने और कौन-कौन से दावे अपनी किताब में किए थे:- यहां प्रस्तुत है, उसी के अंश:-

-2009 की ज़बरदस्त जीत के बाद भी मनमोहन सिंह की रीढ़विहीनता समझ के परे थी, अगर वो अपने ही दफ़्तर में अपनी पसंद के अधिकारियों की नियुक्ति करवा पाने में अक्षम थे तो इसका मतलब ये था कि उन्होंने बहुत जल्दी ही 'दूसरों' को जगह दे दी थी।

-सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद सुपर कैबिनेट की तरह काम करती थी और सभी सामाजिक सुधारों के कार्यक्रमों की पहल करने का श्रेय उसे ही दिया जाता था।

-मनमोहन सिंह की अवहेलना करने का ये आलम था कि अमरीका जैसे देश की यात्रा कर वापस आने के बाद विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने इस बात की ज़रूरत भी नहीं समझी थी कि वो इस बारे में मनमोहन सिंह को ब्रीफ़ करें।

-सोनिया गांधी का जून 2004 मे सत्ता त्याग देना अंतरआत्मा की आवाज़ सुनने का नतीजा नहीं था बल्कि एक सोचा समझा बड़ा राजनीतिक क़दम था।

अब आप ग़ौर करें कि अग़र सोनिया गांधी और राहुल गांधी की ये बातें (जो किताब के मुताबिक हैं) जनता के बीच फिल्म के रूप में आती हैं, तो चुनाव में उसका क्या असर हो सकता है? इसमें कोई संदेह नहीं कि मनमोहन सिंह एक ऐसे शख़्स रहे हैं, जिन्हें देखकर हर भारतीय के मन में बहुत ही आदरभाव हमेशा रहेगा, उनकी योग्यता पर भी कोई संदेह नहीं कर सकता। आख़िर पी.वी. नरसिंहराव और मनमोहन सिंह की जोड़ी ने मिलकर आर्थिक उदारीकरण के जिस दौर की शुरुआत की थी, उसे कौन भूल सकता है। लेकिन किताब के मुताबिक अग़र गांधी परिवार ऐसे शख़्स के साथ बेहद कमज़ोर प्रधानमंत्री के तौर पर व्यवहार करता दिखाई देगा, तो जाहिर है कांग्रेस से खीझ बढ़ेगी और भाजपा इसका फायदा उठाना चाहेगी। 

जिस दौर में यह फिल्म आ रही है, उस दौर में लोग भाजपा से काफी नाराज दिखाई दे रहे हैं। 65 लोकसभा सीटों वाले तीन राज्यों में बुरी तरह से हारने के बाद संसद में तीन तलाक को पास करना, बाहर राममंदिर पर अध्यादेश जैसी बातों का प्रचार करना, रॉफेल के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में गलत तथ्यों के प्रस्तुतिकरण ने जनता को कहीं न कहीं यह सोचने को भी मजबूर किया है कि सही क्या है? इससे पहले नोटबंदी और जीएसटी के मुद्दे को लेकर भी काफी हो-हल्ला हो चुका है।

एक विशेषज्ञ के तौर पर हम यह नहीं कह सकते कि इसका कितना फायदा या नुकसान हुआ, लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर यह समझ नहीं आया। कुछ व्यापारी जरूर जीएसटी से सहमत-असहमत हो सकते हैं। तो ऐसी सफलताएं, जिसे जनता के सामने सरकार गिना नहीं सकती या समझा नहीं सकती, उन्हें रोकने के लिए द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर बहस का आगाज़ कर सकती है। इस बहस में इस बात को ज़ोर-शोर से उठाया जाएगा कि एक परिवार के हाथों आख़िर सत्ता की बागडोर क्यों? क्या कांग्रेस में सक्षम नेतृत्व का अभाव है? क्या कांग्रेस गांधी परिवार के बिना सर्वाइव नहीं कर सकती और इन्हीं मुद्दों के ईर्द-गिर्द चुनाव से पहले धारणा बनाने का काम किया जाएगा। ध्यान रहे कि राजनीति में यह धारणा या परसेप्शन ही हार-जीत का कारण बनता है।

ट्रेलर में नज़र आने वाले किरदारों के कहे कुछ डायलॉग पढ़िए....

-मुझे तो डॉक्टर साहेब भीष्म जैसे लगते हैं. जिनमें कोई बुराई नहीं है. पर फ़ैमिली ड्रामा के विक्टिम हो गए.

-महाभारत में दो परिवार थे, इंडिया में तो एक ही है।

- 100 करोड़ की आबादी वाले देश को कुछ गिने-चुने लोग चलाते हैं, ये देश की कहानी लिखते हैं।

-न्यूक्लियर डील की लड़ाई हमारे लिए पानीपत की लड़ाई से भी बड़ी थी।

-पूरे दिल्ली के दरबार में एक ही तो ख़बर थी कि डॉक्टर साहेब को कब कुर्सी से हटाएंगे और कब पार्टी राहुल जी का अभिषेक करेगी।

-मुझे कोई क्रेडिट नहीं चाहिए। मुझे अपने काम से मतलब है। क्योंकि मेरे लिए देश पहले आता है।

-'मैं इस्तीफ़ा देना चाहता हूं।' एक के बाद एक करप्शन स्कैंडल, इस माहौल में राहुल कैसे टेकओवर कर सकता है।

 

यशवंत गोहिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।