By पीयूष कुमार

छत्तीसगढ़ अपनी प्रकृति और संस्कृति की विशेषताओं के अलावा दो और बातों के लिए महत्वपूर्ण है। एक तो यहां की अधिकतर जमींदारियां आदिवासियों के हाथों रही हैं और दूसरी, बाहरी शोषकों और अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आरंभिक विद्रोहों का सिरमौर छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र रहा है। देश मे जनजातीय विद्रोहों का इतिहास 17 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से आरंभ होता है और बस्तर में ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध प्रथम विरोध का विवरण 1795 में हुए भोपालपटनम संघर्ष के रूप में प्राप्त होता है। यह संघर्ष ब्रिटिश अधिकारी ब्लंट के जगदलपुर प्रवेश के विरुद्ध हुआ था जिसके फलस्वरूप उसे वापस लौटना पड़ा था। यह सीमित और अल्पकालिक संघर्ष था जो आदिवासियों ने किया था।



इसके बाद छत्तीसगढ़ में एक बड़ा विद्रोह हुआ जिसे परलकोट विद्रोह (1825) कहा जाता है। परलकोट बस्तर रियासत की जमींदारी थी जिसके अंतर्गत 165 गांव आते थे। बस्तर में उस समय महिपाल देव शासक थे। परलकोट में अंग्रेज अधीन मराठा शासन के कर्मचारियों और गैर आदिवासियों की मनमानी और शोषण से यह क्षेत्र अशांत हो उठा और 24 दिसंबर 1824 को उनके विरुद्ध संघर्ष के लिए वहां के जमींदार गैंदसिंग के नेतृत्व में परलकोट में एक विशाल सभा हुई। इस संघर्ष को सफल करने धवड़ा वृक्ष की टहनियों को क्षेत्र में घुमाकर संकेत किया गया जिसके अनुसार उसकी पत्तियों के सूखने से पहले सभी को संघर्ष के लिए एकत्र हो जाना था।

10 जनवरी 1825 को माड़िया आदिवासियों ने गैंदसिंग के नेतृत्व में मराठो और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया। आरंभिक चोट से घबराए अंग्रेज अधिकारी एवेंग्यु ने चांदा (महाराष्ट्र) से कैप्टन पेब की मदद बुला ली और अंग्रेज और मराठा की संयुक्त सेनाओं ने 10 जनवरी 1825 को परलकोट घेर लिया। इस संघर्ष में अबूझमाड़ियों के पारंपरिक हथियार आधुनिक हथियार का सामना करने में असफल रहे और दस दिनों के कड़े संघर्ष के बाद अंग्रेजी सेना इस विद्रोह का दमन करने में सफल रही। उन्होंने गैंदसिंग को गिरफ्तार कर लिया और आज ही के दिन 20 जनवरी 1825 को परलकोट में उनके महल के सामने फांसी दे दी।

यह एक आदिवासी विद्रोह था जो छत्तीसगढ़ में ब्रिटिश अत्याचार से मुक्ति के संघर्ष की शानदार गाथा है। इस संघर्ष के प्रथम नायक शहीद गैंदसिंग को उनके बलिदान दिवस पर हूल जोहार।