By पीयूष कुमार

हल्के बैंगनी रंग के यह चिरइया फूल बचपन के संगवारी रहे हैं। संगवारी बोले तो यही नाता कि बस ये भी हैं, हम भी हैं। इसलिए भी कि ये वहीं कहीं हरियाते- खिलखिलाते, जहां- जहां मैं रहा। बाड़ी के कोने में, बाजू की किसी गिरी दीवार की मिट्टी में तो बियाबान में। मुझे याद है, सावन आते तक इसके छोटे पौधे प्राइमरी स्कूल में लाइन में लगाये जाते और भादो आते ही इसमें यह फूल चमकते। बचपन मे हम इसकी फलियों को फोड़कर पलकों पर चिपकाने का खेल खेलते। लगता, पलक उल्टी हो गयी है। सात-आठ साल की उम्र में यही सब तो किया जा सकता था। एक और बात याद आ रही कि मैं अपनी पट्टी (स्लेट) पोंछने के लिए इसके तने का प्रयोग करता। पत्ती (ब्लेड) से इसके तने को तीन चार इंच लम्बी काटता और इससे स्लेट पोंछता क्योंकि इससे पानी निकलता। यह भद्र तरीका था मेरा क्योंकि कुछ बच्चों जैसा स्लेट को थूक कर नही मिटा पाता था। ये वो दिन थे, जब पांचवी बोर्ड की कक्षा बड़ी होती थी और 'नागपंचमी' कविता मनभावन लगती थी। 

इधर चिरैया फूल के बारे में गूगल से पूछा तो पता लगा, यही गुलमेहँदी है और इसकी हाइब्रिड नस्लें कई सुंदर रंगों में उपलब्ध हैं। देखा है मैंने भी। बहुत खास लगता है। यह देखकर 'निराला' की "अबे सुन बे गुलाब..." की फीलिंग होती है। खैर, पता यह भी चला कि गुलमेहँदी बतौर औषधि विभिन्न आजकल के सभी अनिवार्य रोगों के इलाज में काम आता है, और इसकी बाकायदा खेती की जाती है। पता नही लोक इसके औषधीय गुणों से परिचित है या नही।

इधर हमारा यह लोकल हल्के बैंगनी वाला चिरइया कचरे के ढेर में दो मीटर तक बढ़ गया है और हरियाली के चादर में सितारे सा झपकता दिख जाता है। ज्यादा दिन नही दिखेगा यह। महीने भर बाद इसका बजार खतम है। मुझ जैसे सभी जो ग्रामीण पृष्ठभूमि से हैं, इसे जानते हैं पर आजतक कोई चर्चा हुई नही इसकी कभी। इतना ही जान पाया कि कमरछठ (हलषष्ठी) में यह फूल चढ़ाते हैं पर यह पूर्ति का सिद्धांत मात्र है। कोई खुशबू नहीं, लम्बी उम्र नही पर यह बचपन का यह साथी हर सावन आता है, चला जाता है। इसके होने से लगता है कि सावन और धरती वही पुराने वाले हैं ...

 

(पीयूष कुमार साहित्यकार हैं और वर्तमान में हिंदी विभाग में बतौर एसिस्टेंट प्रोफेसर छत्तीसगढ़ में रामानुजगंज के शासकीय महाविद्यालय में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। )