सीएम भूपेश बघेल के एक अनोखे अंदाज को प्रदेश सीनियर फोटो जर्नलिस्‍ट गोकुल सोनी ने अपने कैमरे कैप्‍चर किया और बता रहे हैं उस खास मोमेंट के बारे में कुछ दिलचस्‍च बातें, पढ़ें उन्‍हीं के शब्‍दों में 

रायपुर ।  मुख्यमंत्री भूपेश बघेल मंगलवार को अपनी सरकार के सौ दिन पूरे होने पर प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय राजीव भवन में पत्रकारों के साथ चर्चा कर रहे थे। चर्चा समाप्त होने के बाद वे अचानक डायस से उतरकर पत्रकारों के बीच प्लास्टिक की साधारण कुर्सी पर आकर बैठ गए। अपने इस तरह नीचे बैठने का कारण बताते हुए उन्होंने बताया कि गांव में जब कोई युवक पहली बार या फिर नई घड़ी पहनता है तो वह हाथ को बार-बार ऊपर उठाकर लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है ताकि लोग उसकी घड़ी को देख लें। मुख्यमंत्री ने कहा कि मैं भी आज नई भंदई पहनकर आया हूं जिसे आप लोगों को दिखाना चाहता हूं। यदि मैं पैर को हिलाकर इस ओर इशारा करूं तो यह असभ्यता होगी। मुझे खुद भी अच्छा नहीं लगेगा इसलिए अपने पैर दिखाने नीचे बैठ गया हूं।

दरअसल मुख्यमंत्री अपने पैरों पर नई भंदई (सैंडिल) पहने हुए थे। इस भंदई को वे मोंहदीघाट गांव से लाए थे। साथियो, मैं कुछ पुरानी बातें बताना चाहता हूं-छत्तीसगढ़ के गांवों में किसी समय भंदई पहनने का रिवाज था जो समय के साथ अब लुप्त हो गया। गांवों में पुरुष भंदई पहनते थे और महिलाएं अकतरिया पहनती थीं। दोनों की बनावट लगभग एक जैसी ही होती थी। भंदई और अकतरिया शुद्ध चमड़े की बनी होती थी। अकतरिया और भंदई पहनकर स्त्री-पुरुष खेती-किसानी का काम करते थे। दरअसल नाहना-बरही (बैलगाड़ी या हल में जुडे को बांधने के लिए बनाई गई चमड़े की रस्सी) की तरह भंदई-अकतरिया भी पौनी-पसारी का एक अंग था।

पहले गांव के बड़े किसान जो अपने खेतों के लिए सौंजिया (नौकर) और गोबर-कचरा आदि कार्य के लिए नौकरानी रखते थे तो उनकी मजदूरी के अलावा कंबल-खुमरी के साथ-साथ दो जोड़ी भंदई-अकतरिया भी देते थे। भंदई-अकतरिया में पालिश करने की बजाय तेल लगाने से उसमें नई चमक आ जाती थी। तेल लगी भंदई को हाट-बाजार या फिर त्यौहार के दिन विशेष रूप से पहना जाता था। छत्तीसगढ़ के लुप्तप्राय भंदई को पहनकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल बहुत खुश थे और इस खुशी को वे सभी के साथ बांटना चाहते थे। उन्होंने भंदई पहनकर लोगों को यह संदेश भी दे दिया कि वे विशुद्ध छत्तीसगढिय़ा हैं । नरवा, घुरवा और गरुआ की बात करने वाले वे खुद छत्तीसगढिय़ा संस्कृति को स्वाभाविक रूप से जीते हैं।