मनोरा

वाहिद खान। छत्तीसगढ़ में एक ऐेसा स्थान है जहां महिषासुर के वंशज रहते हैं। महज 250 की संख्या में प्रदेश में निवासरत इन आदिवासियों को असुर जनजाति के नाम से भी जाना जाता है।

छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में मनोरा विकासखण्ड के पंचायत गजमा, लुखी, काँटाबेल, कुलाडोर, विरला, लुखी, दौनापाठ में ये इस जनजाति के लोग निवासरत हैं। The Voices संवाददाता से मुलाकात के दौरान असुर जनजाति के लोगों ने कहा,  "जितना ध्यान छत्तीसगढ़ सरकार कोरवाओं पर दे रही है, हम चाहते हैं कि उतना ही ध्यान और वही अधिकार असुर जनजाति को भी मिले।" बातचीत में उन्होंने दावा किया कि पड़ोसी राज्य झारखंड में असुर जनजाति के आदिवासी लगभग एक लाख की संख्या में निवासरत हैं और झारखंड सरकार उनकी सारी जरूरतों को पूरा कर रही है। उदाहरणस्वरूप असुर जाति के 5वी पास व्यक्ति को भी नौकरी मिल जाती है लेकिन छत्तीसगढ़ में असुर जनजाति पर सरकार घ्यान नहीं दे रही है। उनका कहना है कि यहां सरकार पहाड़ी कोरवा को ज्यादा ध्यान में रखती है जबकि उन्हें उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है।

असुर जनजाति के लोगों का यह भी कहना कि छत्तीसगढ़ से उनकी जनजाति की जनसंख्या छत्तीसगढ़ में तेजी से घट रही है। वो कहते हैं, " पहले हमारी जनजाति के लोग यहां काफी जनसंख्या में थे, मगर ऐसा दौर शुरू हो गया कि पूरे छत्तीसगढ़ में अब हमारी जनसंख्या 250 के लगभग ही रह गई है।"

लोहा पिघलाना था प्रमुख काम

एक समय में लोहा पिघलाने का कार्य ही असुरों की मुख्य आजीविका थी, वो बताते हैं कि लोहा पिघलाने उनके समुदाय के लिए आजीविका का एक मात्र साधन था लेकिन समय बीतने के साथ जंगल पर लगे प्रतिबंध के कारण लौह अयस्क और उसे पिघलाने के लिए जरूरी चारकोल उपलब्ध होना कठिन होता गया। वर्तमान समय में यह उद्योग इनके लिए अतीत की बात बन कर रह गए हैं। हांलाकि अब भी कुछ गिने-चुने परिवार हैं जो लोहा पिघलाने का काम आज भी करते हैं। असुर चाहते हैं कि यदि उनके लुप्त इस कार्य को फिर एक बार सहारा मिलता है तो उनकी आय बढ़ सकती है।

परंपरा

असुरों में यह विश्वास है कि उनके आवास के आस-पास पहाड़ियों और वृक्षों में उनके देवी-देवता निवास करते हैं और यदि समय पर बैगा पुजारी द्वारा उन्हें प्रसन्न नहीं किया गया तो उनके परिवार और गांव पर देवी प्रकोप छूट पड़ेगा। सिगबोंग सूर्य इनका प्रमुख देवता है। असुर जनजाति के लोग अपने पूर्वजों की भी पूजा उपासना करते हैं। सरहुल और कर्मा इनके मुख्य त्यौहार हैं।

मान्यता

असुर यह जानते है कि नौ माह की गर्भवती महिला बच्चे को जन्म देती है, लेकिन शिक्षा से दूर पीढ़ी के लोग महीनों की गिनती नहीं जानते है। अक़्सर समाज की बड़ी बूढ़ी महिलाओं के द्वारा गर्भवती महिला के शारीरिक विकास और अपने अनुभव के आधार पर ही आमतौर पर गर्भकाल का अंदाज लगाया जाता है।  प्रसव समाज की ही कोई बड़ी- बूढ़ी महिला ही देख रेख में कराया जाता है। बच्चे के जन्म के तुरन्त बाद वहां मौजूद किसी महिला द्वारा उसकी नाभि नाल छुरी या हंसिया से काट कर उसे किसी एकांत स्थल पर जाकर जमीन में गाड़ दिया जाता है।

;