रायपुर। हिंदू धर्म में तुलसी के पौधे को माता के रूप में पूजा जाने का विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार जिस घर में तुलसी का पूजन रोज सुबह ब्रम्ह मुहूर्त किया जाता है, वहा हमेशा भगवान वास करते है। माना  जाता है घर के आंगन में मुख्य रूप से तुलसी का पौधा होने से किसी भी तरह की श्वास से जुडी बीमारी नहीं होती। तुलसी के पत्ते को औषधि के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है।

इस दिन तुलसी के पूजन का विशेष महत्व होता है। तुलसी माता को दुल्हन कि तरह सजा कर घर में गन्ने का मंडा बनाकर भगवान विष्णु के रूप शालीग्राम से शादी कराई जाति है।  इस दिन को छोटी दीवाली के रूपं में भी मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु ने छल से जलंधर का रूप लेकर वृंदा का सतीत्व भंग का दिया था। जिसके कारण वृंदा ने श्री हरी विष्णु को श्राप दे दिया जिससे वो एक शिला के रूप में परिवर्तित हो गए और वृंदा ने आत्मदाह कर लिया, तब उसकी की राख से तुलसी का पौधा उत्पन हुआ। वृंदा को तुलसी के स्वरूप में पूजा जाता है।  भगवान विष्णु के हर स्वरूप में तुलसी पत्ता जरुर चढ़ाना चाहिए इसे भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न होते हैं। धार्मिक शास्त्रों में इस दिन तुलसी का पूजन शुभ माना गया है।

देव उठनी एकादशी के दिन पूजन विधि और विवाह का शुभ मुहूर्त -
ज्योतिषाचार्य दत्तात्रेय होसकर ने बताया कि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी मनाई जाती है। इस दिन भगवान श्री हरी विष्णु 4 माह की योग निंद्रा के बाद जागते है। योग निंद्रा के समय सभी शुभ कार्य वर्जित होते है। इस बार देवउठनी एकादशी शुक्रवार 8 तारीख को पढ़ रही है। ध्यान देने वाली बात यह है की इस बार देवउठनी के ठीक पूर्व विवाह के कारक गृह बृहस्पति ने अपना स्थान बदल लिया है और वह अपने ही घर धनु राशी में पहुच कर अत्यंत बलवान हो गया है। अत: आने वाला समय शुभ रहने वाला है। देवउठनी एकादशी पर पूजा का शुभ मुहूर्त सांध्य काल में 5।49 बजे से 7।48 तक है।

ज्योतिषाचार्य के अनुसार विवाह का शुभ मुहूर्त -
नवम्बर की 19 तारीख से 20,22,23 और 28 तक है, और दिसम्बर में 11 और 12 तारीख के सिर्फ दो मुहूर्त है। जनवरी में 15 से 18,20,29,30 और 31 तक मुहूर्त है।

भगवान को जगाने के लिए आज इन मंत्रों का करे उच्चारण -
उत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पतये। त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्॥

उत्थिते चेष्टते सर्वमुत्तिष्ठोत्तिष्ठ माधव। गतामेघा वियच्चैव निर्मलं निर्मलादिशः॥
शारदानि च पुष्पाणि गृहाण मम केशव।