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By संजीव खुदशाह

सामाजिक न्या‍य की अवधारणा एक बहुत ही व्यापक शब्दो है। इसमें एक व्यक्ति के नागरिक अधिकार तो है ही साथ ही सामाजिक (भारत के परिप्रक्ष्य में जाति एवं अल्प‍संख्यक) समा‍नता के अर्थ भी निहितार्थ है। ये निर्धनता, साक्षरता, छूआ-छूत, मर्द-औरत हर पहलुओं को और उसके प्रतिमानों को इंगीत करता है।

सामाजिक न्याय की अवधारणा का मुख्य अभिप्राय यह है की नागरिक-नागरिक के बीच सामाजिक स्थिति में कोई भेद न हो। सभी को विकास के समान अवसर उपलब्ध हो। विकास के मौके अगड़े-पिछड़े को उनकी आबादी के मुताबिक मुहैया हो। ताकि सामाजिक विकास का संतुलन बनाया जा सके। सामाजिक न्याय का अंतिम लक्ष्य यह भी है की समाज का कमजोर वर्ग, जो अपना पालन करने के लिये भी योग्य न हो। उनका, विकास में भागीदारी सुनिश्चित हो जैसे विकलांग, अनाथ बच्चे। दलित,  अल्पसंख्यक, गरीब लोग, महिलाएं अपने आपको असुरक्षित महसूस न करे।

संसार की सभी आधु‍निक न्याय  प्रणाली प्रकृतिक न्याय की कसौटी पर खरा उतरने की चेष्टा करती है, अंतिम लक्ष्य  होता है कि समाज के सबसे कमजोर तबके का हित सुरक्षित हो सके अन्याय न हो। यदि वर्तमान भारतीय न्याय प्रणाली पर गौर करे तो यह कई विभागों में बांटी गई है, जैसे फौजदारी, दीवानी, कुटुम्ब , उपभोक्ता आदि आदि। लेकिन इन सभी का किसी न किसी रूप में सामाजिक न्याय से सरोकार होता है। सामाजिक न्याय की अवधारणा के मुख्य आधार स्तम्भ ये है।

  1. जातीय ऊंच-नीच को मिटाना
  2. धार्मिक ऊंच-नीच की मान्यता को मिटाना
  3. लैंगिक भेदभाव को खत्म करना
  4. क्षेत्रीयता के भेदभाव को खत्म करना

डॉं. अंबेडकर के सामाजिक न्याय के सिद्धांत को समझने से पहले परंपरागत सामाजिक न्याय व्यवस्था को जानना आवश्यक है। भारत की सामाजिक न्याय प्रणाली में मनु स्मृति के नियम कड़ाई से लागू होते है। आज भी खाप पंचायतों द्वारा दिये जाने वाले निर्णयों का आधार मनु स्मृति ही है। खाप पंचायत ही क्यों समस्त जातीय पंचायते अपने सामाजिक फैसले अंजाने मनु के नियमों का पालन करते देखी जाती है। उदाहरण देखे- यदि कोई भाई-बहन सम्पति के विवाद को लेकर परंपरागत जातिय पंचायत से फैसला चाहता है तो उस जाति पंचायत बहन को सम्‍पत्ति  से बेदखली का फरमान जारी करेगी। प्रश्न ये है की ऐसे फरमान का आईडिया इन्हे कहां से मिलता है, दरअसल ये आईडिया इन्हें मनुस्मृति से मिलता है जो भारतीय जन मानस में समाया हुआ है।

वास्तव में भारत में परंपरागत सामाजिक न्याय प्रणाली निम्न तीन बिंदुओं पर आधारित होती है।

  1. अंधविश्वास
  2. जाति भेद (जातिय श्रेष्ठता एवं नीचता)
  3. लैगिक भेद (महिलाओं का मानवीय अधिकार से बे दखल करना)

इस प्रणाली पर विश्वास या श्रद्धा का मुख्य आधार धार्मिक ग्रंथ है जो ऐसे विश्वासों की पुष्ठी करते है। इन ग्रन्थों पर प्रश्न न उठे इसलिए इन्हे अपोरूषेय (र्इश्वर द्वारा लिखित) कहा गया। ऐसा करने का एक मात्र लक्ष्य यही था , किसी खास जाति विशेष, लिंग विशेष को बिना मेहनत सुख सुविधा मुहैया कराया जा सके। गौरतलब है कि ऐसा विश्‍व के अन्‍य समुदाय में भी ऐसा होता था। ये ग्रन्थ ब्राम्हण को सर्वश्रेष्ठ और अन्य  को मुक्त  गुलाम बनाने की ओर प्रेरित करते है। ग़ौरतलब है कि भारत में जातीय श्रेष्ठ‍ता का आधार जन्म है न की कर्म।

मनु स्मृति अध्याय 10 श्लोक क्रमांक 129 देखे

किसी भी शूद्र को संपत्ति का संग्रह नही करना चाहिए चाहे वह इसके लिए कितना भी समर्थ क्यों न हो, क्योंकि जो शूद्र धन का संग्रह कर लेता है, वह ब्राम्हणों को कष्ट‍ देता है।

मनुस्मृति अध्याय 1 श्लोय 87 से 91

देखे ब्राम्हणों के लिए उसके अध्ययन अध्यापन, यज्ञ करने दूसरों से यज्ञ कराने दान लेने एवं देने का आदेश दिया। लोगो की रक्षा करने, दान देने यज्ञ करने पढ़ने एवं वासनामयी वस्तुओं से उदासीन रहने का आदेश क्षत्रियों को दिया। मवेशी पालन, दान देने यज्ञ कराने पढने व्यापार करने धन उधार देने तथा खेती का काम करने की ज़िम्मेदारी वेश्यों की दी गई। भगवान ने शूद्र को एक कार्य दिया है उन पूर्व लिखित वर्गो की बिना दुर्भाव से सवा करना।

भारत मे आजादी मिलने के दौरान दो आधुनिक सामाजिक न्याय की अवधारणाये उभर कर सामने आई।

  1. गाँधीवादी सामाजिक न्याय की अवधारणा
  2. अंबेडकरवादी सामाजिक न्या‍य की अवधारणा
  3. गाँधीवादी सामाजिक न्या‍य की अवधारणा- गाँधीजी अपने आपको प्रगतिशील एवं आधुनिक मानते थे। वे आधुनिक न्याय प्रणाली को तो मानते थे लेकिन जातीय और धार्मिक ऊंच नीच को भी मान्यता देते थे। वे ये तो मानते थे की सभी जातियों को आपस में मिलने बैठने का अधिकार होना चाहिए, छुआ-छूत नही होना चाहिए लेकिन जाति आधारित कार्य नही त्यागना चाहिए। इस परिप्रेक्ष्य में वे कहते की यदि तुम अपनीजाति में निर्धारित जातिगत गंदे कामों को मन लगाकर करते हो तो तुम्हारा अगला जन्म ऊंची जाति में होगा। इस प्रकार वे पूर्न जन्म  में वि‍श्वा‍स करते थे। एक खास वर्ग के नेता गांधी के इस सिध्दांत को मानते है। अब इस सिद्धांत को दक्षिण पंथी विचार धारा के नाम से भी जाना जाता है।
  4. अंबेडकरवादी सामाजिक न्याय की अवधारणा– डॉं. अंबेडकर का सामाजिक न्याय का सिध्दांत प्राकृतिक न्याय के अवधारणा के ज्यादा नज़दीक है। डॉं अंबेडकर गाँधीवादी न्याय के सिद्धांत को एक छल कहते थे। वे मानते है की जिस सामाजिक न्याय के सिद्धांत में जातिगत ऊंच नीच, धार्मिक कट्टरता, लिंग भेद, पूर्वजन्म‍ की कल्पना को मान्याता दी जाती है। वह सामाजिक न्याय हो ही नही समता। वे इसे ब्राम्हणवादी न्याय का सिध्दांत कहते है। क्योकि इस सिंध्दांत में किसी जाति विशेष लिंग विशेष का हित सुरक्षित है। इसलिए डॉं अंबेडकर जिस सामाजिक न्याय की अवधारणा का प्रतिपादन करते है वे नस्ल भेद, लिंग भेद और क्षेत्रीयता के भेद से मुक्त है। इस अवधारणा में समाज के कमजोर वर्ग के साथ न केवल न्याय हो बल्कि उनके अधिकार और हित सुरक्षित हो । संविधान निर्माण में उनके इस सिद्धांत की भूमिका स्पष्ट  देखी जा सकती है।

डॉं अंबेडकर का सामाजिक न्या‍य सिद्धांत निम्न सामाजिक बाधाओं पर काम करता है।

  1. सामाजिक बहिष्कार
  2. पुरूष सत्ता
  3. जातीय आधारित काम करने की बाध्यता
  4. भूमि या संपत्तियों का असमान वितरण
  5. महिलाओं को पिता एवं पति की संपत्ति में अधिकार

भारतीय संविधान इस मामले में सर्वोच्च और उत्कृयष्ठ है। इसमें समाजिक न्याय की पूर्ति मे लिए इन बाधाओं को दूर करने का प्रयास किया गया है। सामाजिक न्याय पाने की दिशा में विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया सहित तमाम केंद्रों के प्रयास कहीं न कहीं गलत कार्यान्वयन और असंतुलन के कारण फलीभूत नहीं हो पा रहे हैं। जरूरत और समय की मांग है कि उचित और संतुलित नीतियों -व्यवहारों को लागू किया जाये जिससे कि सामाजिक न्याय को सामाजिक प्रगति का हिस्सा बनाया जा सके।

अरस्तू के अनुसार व्यक्ति समाज का सदस्य तो हो सकता है लेकिन नागरिक वह तभी कहलायेगा, जबकि वह राज्य की राजनीति में सक्रिय रूप से योगदान करता है और इसी संदर्भ में सक्रिय रूप से योगदान करता है और इसी संदर्भ में संदर्भ में अरस्तू कहते हैं कि किसी भी राज्य या समाज में किसी व्यक्ति का जो सक्रिय योगदान होता है उसके समानुपात में समाज की सम्पत्ति का उचित वितरण वितरणात्मक न्याय कहलाता है और इसका निषेध वितरणात्मक सामाजिक अन्याय कहलाता है। लेकिन यह एक आदर्श स्थिति है। व्यवहार में यह कहीं पर भी लागू नहीं है क्योंकि व्यक्ति सदस्य के योगदान का ठीक-ठीक आंकलन संभव नहीं है। इसका कोई पैमाना नहीं है। सीमा रेखा नहीं है!

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि सामाजिक न्याय के नारे ने विभिन्न समाजों में विभिन्न तबकों को अपने लिए गरिमामय ज़िंदगी की माँग करने और उसके लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया है। खास कर वंचित तबको में।  सैद्धांतिक विमर्श में भी समा‍जवाद, कम्युयनिष्ठि सहित अंबेडकरवाद जैसे सामाजिक न्याय में बहुत सारे आयाम जुड़ते गये हैं। यहां यह बताना जरूरी है की विकसित समाज की तुलना में विकासशील समाजो में सामाजिक न्यासय का संघर्ष रक्ती रंजीत है। इन संघर्षो के फलस्वरूप समाजों में बुनियादी बदलाव हुए हैं।

आज जिस प्रकार से भारतीय जेलों में विचाराधीन कैदी भारी संख्या में अजा अजजा और अल्पपसंख्यक वर्ग से आते है, एक आँकड़े के मुताबिक वे अपनी आबादी के 30 प्रतिशत है। जिस प्रकार आरक्षण के खाली पदो को योग्य  उम्मीदवार नही कहकर उच्च वर्ग के सक्षम वर्ग द्वारा भरा जाता है, जिस प्रकार एक बलात्कार पीड़ित महिला को ही इसके लिए दोषी ठहराया जाता है, जिस प्रकार देश के 40 प्रतिशत गरीब बच्चों से बाल श्रम लिया जाता है, उस देश में लगता है समाजिक न्याय आज भी कोशो दूर है। लेकिन इसका सुखद पहलू यह है की आज की मीडिया, साहित्य  और प्रगतिशील जगत इस मुद्दे को बार बार सामने लाता रहा है। इससे समाजिक न्याय के पक्ष में माहौल बना है। ये माहौल देश के कर्णधारों को इस विषय पर सोचने के लिए मजबूर करेगा। तब कही जाकर देश में सही मायने में सामाजिक न्याय का एक माहौल तैयार हो सकेगा। और यह समाज एक विकसित समाज कहलायेगा।

(ये लेखक ने निजी विचार हैं )