पोटका (पूर्वी सिंहभूम)। पूरे देश में डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया जैसे बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है, परन्तु देश के कुछ इलाको में आज भी पानी जैसी मूल आवश्यकताओं के लिए जूझना पड़े, तो यह काफी चिंतनीय है। प्यूरीफायर और मिनरल वाटर वाले युग में आज भी कुछ लोग गड्ढे का पानी पीने के लिए मजबूर हैं। यह व्यथा पूर्वी सिंहभूम जिले के मुसाबनी प्रखंड के माटीगोड़ा पंचायत के गांव जोबला की है। डेढ़ सौ आबादी वाले इस गांव के ग्रामीण आज भी चुएं (गड्ढे) का पानी पेयजल में इस्तेमाल करते हैं।

दयनीय स्थिति तब होती है, जब ये जलाशय सूख जाते हैं और बचे जलाशयों का बंटवारा किया जाता हैं। यही नहीं, ये गाँव अंत्योदय कार्ड, उज्ज्वला योजना समेत अन्य सभी लाभकारी योजनाओं से भी वंचित हैं। चूल्हे जलाने के लिए ग्रामीण जंगल से लकड़ियां काटते हैं। जादूगोड़ा के टिलाईटाड़ से तीन किलोमीटर दूर पहाड़ों से घिरे आदिवासी बहुल इस गांव की पथरीली सड़कें भी अपने कायापलट होने के इंतेजार में हैं।



पूर्व विधायक के वादे धरे के धरे रह गये

दो वर्ष पूर्व घाटशिला विधायक लक्ष्मण टुडू इस गांव में आये थे। ग्रामीणों ने अपनी सपनों को पूरा होने की उम्मीद में उनका भव्य स्वागत किया था। ग्रामीणों के स्वागत से खुश पूर्व विधायक ने भी ग्रामीण सड़क को बनवाने, पेयजल की व्यवस्था करने समेत दर्जनों वायदे किये। लेकिन बाद में नेताजी अपने वायदों को भूल गए। समय बीतने के साथ ग्रामीण भी भूलकर अपनी पुरानी जिंदगी में व्यस्त हो गये।

सेविका अपने घर में चलाती हैं आंगनबाड़ी केंद्र

जोबला गांव के बच्चों को बेहतर पोषण के साथ शिक्षा भी मिले, इसके लिए यहां आंगनबाड़ी केंद्र भी खुला था। लेकिन अब सेविका जीरामुणी टुडू गांव से दूर सुसनगुड़िया में अपने घर में आंगनबाड़ी केंद्र चलाती हैं। ग्रामीणों की मानें तो जोबला में बना केंद्र पिछले दस वर्षों से बंद है।

जोबला के ग्रामीणों के लिए मोबाइल महज खिलौना ही है। मोबाइल का नेटवर्क नहीं मिलने से ग्रामीण बाहरी दुनिया से कटे रहते हैं। गांव के उत्क्रमित मध्य विद्यालय के शिक्षकों को बायोमिटिक हाजरी बनाने में भी काफी परेशानी होती है। वे नेटवर्क के लिए हाथ में मोबाइल लेकर घंटों घूमते रहते हैं।