यार, पता है? कुछ फ़ाइलें न, ब‌हुत छरहरी होती हैं, नाज़ुक सी, नई नवेली सी। ऐसे आती हैं  जैसे कोई सुन्दरी प्रणय निवेदन कर रही हो कि स्वामी मैं आपकी ही हूँ। वैसे प्रायः ऐसा इसलिये होता है क्युंकि इसे आप ही शुरु करते हैं और इसमें कम पन्ने होते हैं, हीहीहीही। दूसरी तरफ़ कुछ मिसिलें सदियों के पन्ने अपने आग़ोश मे लिये, लो कार्ब और ज़ीरो फ़ैट के प्रपंचों से दूर, सूमो पहलवान जैसी विचरती हैं, इनका इस्तेमाल वर्ज़िश के लिये भी करते हैं ऑफ़िस के लोग। कुछ फ़ाइल्स बड़ी घरेलू क़िस्म की होती हैं, अपने घर से कभी निकलती ही नहीं। उधर कुछ फ़ाइल्स अंगार की तरह होती हैं जिसके पास जाती हैं, उसके हाथ जलने लगते हैं और वो तुरंत इसे दूसरे के पास भेज देता है। लोगों की बताऊँ तुझे तो- कुछ लोग फ़ाइल्स के ब्यूटी पार्लर जैसे होते हैं यानी कि फ़ाईल को कैसे "सजाना" है, इसका पांडित्य उनके पास होता है।उनके फ़ाईल-ज्ञान की पाण्डुलिपि का अमृतपान सभी करते हैं। कभी कभी किसी चैम्बर मे कोई जब फ़ाईल लेके जाता है तो लगता है कि वो सुईसाइड बॉम्बर की तरह फ़ाइल्स की सुईसाइड बेल्ट बाँध के आया है क्युंकि  फ़ाईल साइन करते करते करोड़ों कमियाँ छर्रों, शार्पनेल की तरह निकलते हैं और बंदा सभी के हिस्से का विष पी के नीलकंठत्व को प्राप्त होता है। 

बारोज़गार का जीवन ही फ़ाईल है, फ़ाइलों में क़ैद। बक़ौल 'शबनम अशाई'- 

"वजूद के जो हिस्से 

वजूद की तलाश में खो जाते हैं 

उन का इंदिराज 

ज़िंदगी की किसी भी फ़ाइल में नहीं मिलता"                                      (इंदिराज-दर्ज होना)

वैसे, हक़ीक़तन,हम सबकी फ़ाईल उसके पास है, जो सबकी फ़ाईल पे आख़िरी साइन करता है।

(आईपीएस मयंक श्रीवास्तव की फेसबुक वॉल से...)