By दिवाकर मुक्तिबोध

17 जनवरी को छत्तीसगढ़ में कांग्रेस-राज की स्थापना को एक माह पूरा हो गया। 17 दिसंबर 2018 को भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। फिलहाल उनकी सरकार को फटाफट काम करने वाली सरकार मानना चाहिए जिसका लक्ष्य स्पष्ट है। पार्टी का घोषणा-पत्र उसके सामने है जिसके सर्वाधिक महत्वपूर्ण वायदों पर सरकारी फऱमान जारी हो चुका है। लेकिन यह एक पहलू है जिसमें लोक-कल्याण की भावना प्रबल है। दूसरा पहलू है - राजनीतिक। लक्ष्य है, पूर्ववर्ती भाजपा शासन के दौरान सतह पर आई गड़बडिय़ों एवम् कुछ महाघोटालों की पुन: जाँच। नए सिरे से जाँच की आवश्यकता क्यों है, यह अलग प्रश्न है। इसका तार्किक आधार भी हो सकता है। यह भी संभव है, नई जाँच से नए तथ्य और छिपे हुए चेहरे भी सामने आएं जो जरूरी है पर इसके पीछे राजनीतिक मंशा को भी बखूबी महसूस किया जा सकता है। मंशा है, आगामी अप्रैल-मई में प्रस्तावित लोकसभा चुनाव के पूर्व घोटालों में कथित रूप से लिप्त भाजपा नेताओं, मंत्रियों व अफसरों पर फंदा कसना तथा उन्हें जनता की अदालत में खड़े करना। तीन-चार बड़े प्रकरणों, झीरम घाटी नरसंहार, करीब 36 हजार करोड़ का नागरिक आपूर्ति घोटाला, ई-टेंडरिंग में 4 हजार 600 करोड़ की वित्तीय गड़बड़ी व जनसम्पर्क-संवाद विभाग में भारी वित्तीय अनियमितताओं पर जाँच कमेटी बैठा दी गई है। झीरम का मामला एसआईटी को सौंपा गया है जबकि शेष तीनों राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) को। यह बड़ी हैरत की बात है कि पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने नान घोटाले जिसमें चार्ज शीट अदालत में पेश हो चुकी है, की पुन: जाँच का प्रबल विरोध किया। और इसे वे बदले की कार्रवाई मानते हैं। लेकिन यह जाहिर सी बात है कि सत्ता परिवर्तन के साथ ही भ्रष्टाचार के पुराने दबे, अधदबे मामले बाहर निकाले जाते है व सतही जाँच के बाद रूकी हुई फाइलों पर पड़ी धूल साफ की जाती है और जरुरत के हिसाब से फिर से जाँच बैठाई जाती है। यह सामान्य प्रशासनिक-राजनीतिक प्रक्रिया है। इसमें असहज जैसा कुछ भी नहीं। और जब किसी एक पार्टी का शासन 15 सालों तक चलता रहा हो तो इस दौरान भारी-भरकम गड़बडिय़ों की आशंका स्वाभाविक है जो रमन सरकार के दौर में हुई भी है।

नई कांग्रेस सरकार इसी आशंका का समाधान चाहती है। इसलिए रमन सिंह की प्रतिक्रिया घबराहट भरी राजनीतिक प्रतिक्रिया है। यों भी विधासभा चुनाव में भारी पराजय से उनका व पार्टी का मनोबल गिरा हुआ है। सिर्फ 15 विधायक चुनकर आए हैं। पराजय के बाद पार्टी में गुटीय प्रतिद्वंद्विता जो डेढ़ दशक से सत्ता के दबाव की वजह से दबी हुई थी, उभरकर सामने आई है। हाल ही में जिलेवार समीक्षा बैठकों में नेताओं तथा कार्यकर्ताओं ने पराजय के लिए सरकार, अफसरशाही व प्रादेशिक नेतृत्व को दोषी ठहराते हुए अपनी खीज निकाली तथा उसके बाद सार्वजनिक रूप से आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल पड़ा है। इसके पूर्व विधानसभा नेता प्रतिपक्ष के चुनाव में भी गुटीय राजनीति का इजहार हो चुका था। बृजमोहन अग्रवाल व ननकीराम कंवर की दावेदारी को ठिकाने लगाकर रमन सिंह अपने समर्थक धरमलाल कौशिक को विपक्ष का नेता बनाने में कामयाब हुए थे। पर पार्टी की हताशा का एक उदाहरण तब सामने आया जब उसके ननकीराम कंवर जैसे सीनियर विधायक ने कांग्रेस सरकार को आवेदन सौंपकर विधानसभा सत्र में ही अपनी ही सरकार के शासनकाल में कुछ आईएएस-आईपीएस अफसरों द्वारा बरती गई अनियमितताओं तथा गड़बडिय़ों की जाँच की माँग की। उनके निशाने पर प्रमुख रूप से सुपर सीएम के रूप में चर्चित निजी प्रमुख सचिव रहे अमन सिंह व पुलिस महानिदेशक मुकेश गुप्ता थे। राज्य के इतिहास में यह पहली बार है जब विपक्ष का कोई विधायक जो गृह मंतरी जैसे पद पर रहा हो और जिसके अधीन राज्य का पुलिस महकमा हो, दो वरिष्ठतम अफसरों व अन्य के खिलाफ जाँच बैठाने का अनुरोध करे। इससे स्पष्ट होता है कि रमन सरकार के कार्यकाल में मंत्रियों की क्या स्थिति थी? नौकरशाही के सामने वे कितने असहाय थे। और तो और मुख्यमंत्री रमन सिंह भी जिन्होंने 15 वर्षों तक शासन किया, अपने मंत्रियों, नेताओं तथा कार्यकर्ताओं के स्वाभिमान की रक्षा नहीं कर पा रहे थे। इसका अर्थ है, मुख्यमंत्री अफसरों के एक गिरोह से घिरे हुए थे और उन्हीं के दिमाग से शासन चला रहे थे। दरअसल उन्हें केवल अपनी छवि की चिंता थी जो आम लोगों के सामने हमेशा पाक-साफ बनी रही। इसीलिए ननकीराम कँवर जैसे धाकड़ आदिवासी नेता की भी एक नहीं सुनी गई जबकि वे रमन सरकार को आवेदन पर आवेदन देते गए। अब उन्हीं ननकीराम को कांग्रेस ने हाथों हाथ लिया और आवेदन पर तुरंत कार्रवाई की। डीजीपी गुप्ता का प्रकरण डीजीपी जेल गिरधारीलाल नायक को सौंपा गया है।

यों एक महीना किसी भी सरकार के कामकाज के आकलन का आधार नहीं हो सकता। पर एक संकेत तो मिलता ही है। भूपेश बघेल का शासन वह संकेत दे रहा है, जो सकारात्मक सोच के साथ बहुत उम्मीद भरा है। एक माह के भीतर जनहित व प्रशासन से संबंधित 15-16 फैसले लेना पहली बार शासन का दायित्व संभालने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए आसान नहीं हो सकता लेकिन भूपेश बघेल तपे हुए आक्रामक छवि के नेता है जो अवसरों को गढऩे व माकूल समय पर उनका इस्तेमाल करना बखूबी जानते हैं। अजीत जोगी जैसे धुआँधार नेता को उन्होंनेे बाहर का रास्ता दिखाया तथा पार्टी में अपनी राह के लगभग सभी काँटे चुन लिए। बघेल की कर्मठता, दृढ़ प्रशासनिक क्षमता व तेजी से काम करने की प्रवृत्ति सरकार के कामकाज में झलक रही है। दिए हुए समय के भीतर सरकार को रिपोर्ट न सौंपने वाले 13 कलेक्टरों से जवाब तलब करना, उनसे विलंब के लिए स्पष्टीकरण माँगना, यह जाहिर करता है कि यह कोई लुंज-पुंज सरकार नहीं है। लोक-कल्याणकारी कार्यक्रमों के संदर्भ में प्रशासनिक कसावट का यह एक नमूना है। सरकार के खर्चे घटाने की दृष्टि से उन्होंने उन सफेद हाथियों को हटाना शुरू किया है जो राजकोष पर बोझ बने हुए थे। 22 जनवरी को बघेल सरकार ने सुशासन फेलोशिप योजना के तहत नियुक्त किए गए 41 कंसलटेंट की सेवाएँ समाप्त कर दी। इनकी नियुक्तियाँ पिछली सरकार ने की थी जो शैडो कलेक्टर की तरह काम कर रहे थे और जिन्हें शासकीय योजनाओं की मानिटरिंग का जिम्मा सौंपा गया था। इन्हें सवा से ढाई लाख रूपए प्रतिमाह दिए जा रहे थे। सरकार के कामकाज की यदि ऐसी ही गति बनी रही तो जाहिर है वह एक लोकप्रिय सरकार की अवधारणा को स्थापित व परिभाषित करेगी। बस खतरा केवल एक ही है कि आगे चलकर वह भी पुराने रंग में रंग न जाए।

बघेल सरकार द्वारा एक माह में लिए गए निर्णयों में केवल एक विवादित रहा। वह था, आईपीएस शिवराम कल्लूरी को पुलिस मुख्यालय से हटाकर राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो में पदस्थ करके नई जिम्मेदारियाँ सौंपना जिसकी अक्टूबर 2016 में बर्खास्तगी व गिरफ्तारी की माँग स्वयं भूपेश बघेल ने की थी। तब बघेल विपक्ष के नेता थे। इस नियुक्ति की बड़ी हैरत भरी व स्तब्धकारी प्रतिक्रिया रही। यह बात हजम नहीं हुई कि जो अधिकारी मानवाधिकार का दोषी है, उसे इतने महत्वपूर्ण विभाग में क्योंकर भेजा गया? इसके पीछे कोई खास रणनीति है? बस्तर में पहले एसपी और बाद में आईजी के रूप में कल्लूरी का कार्यकाल काला कार्यकाल माना जाता है। इस दौरान नक्सलियों के खिलाफ मनचाही जंग लडऩे उन्हें शासन की ओर से अघोषित छूट मिली हुई थी जिसका उन्होंने बेजा फायदा उठाया। कल्लूरी पर नक्सलियों की खोजबीन के नाम पर आदिवासियों पर अत्याचार, मानवाधिकारों का हनन, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ बदसलूकी, उनका भयादोहन, उनकी तथा पत्रकारों की बिलावजह गिरफ्तारी जैसे अनेक गंभीर आरोप लगे। मार्च 2011 में सुकमा जिले के ताड़मेटला, मोरपल्ली व तिम्मापुर में कहर बरपाया गया। आदिवासियों के 252 घरों को जला दिया गया। अक्टूबर 2016 में सीबीआई ने उच्चतम न्यायालय में पेश रिपोर्ट में कहा है कि ये घटनाएँ विशेष पुलिस अधिकारियों ने की थी। यही नहीं इस हमले में तीन आदिवासियों की हत्या की गई व महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। कल्लूरी उन दिनों दंतेवाड़ा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक थे। उन पर कथित माओवादी रमेश नगेशिया की हत्या का आरोप है। कल्लूरी की तानाशाही की वजह से जब रमन सरकार की देशभर में थू-थू हुई और कांग्रेस ने मोर्चा खोला तब मजबूर होकर राज्य सरकार को इस अधिकारी को वहाँ से हटाना पड़ा। अब ऐसे कुख्यात को ईओडब्ल्यू की कमान देना तथा तीन बड़े घोटालों की जाँच का जिम्मा सौंपने के पीछे क्या कोई राजनीतिक मकसद है? रमन सरकार के प्रिय रहे इस अधिकारी से बघेल सरकार शायद यह उम्मीद कर रही है कि उसने जहर को जहर से काटने का इंतजाम कर दिया है। पर इस नियुक्ति से सरकार पर छींटे पड़े हैं। यहाँ सवाल है कल्लूरी ही क्यों? क्या पुलिस विभाग में कल्लूरी से बढ़कर और कोई काबिल अधिकारी नहीं है?

बहरहाल, इस एक मामले को छोड़ दिया जाए तो नई सरकार एक ऐसी कार्यशैली विकसित करने की राह पर है जिसके केन्द्र में गाँव-देहात, गरीब आदिवासी, किसान, मजदूर, छोटे कर्मचारी, ग्रामीण महिलाएँ, पिछड़े व अति पिछड़े वर्ग के लोग, छोटे उद्यमी एवम् युवा बेरोजगार है। 15 वर्षों तक शासन करने के बावजूद भाजपा सरकार कई बड़ी चुनौतियाँ जिन्हें सुलझाने में वह असफल रही, विरासत में छोड़ गई है। नक्सलवाद, निराशाजनक औद्योगिक वातावरण, जनस्वास्थ्य से बुरी तरह खिलवाड़ करता प्रदूषण, भारी भरकम बेरोजगारी, सरकार में नीचे से उपर तक फैला हुआ संगठित भ्रष्टाचार व बेलगाम नौकरशाही जिसने अंतत: भाजपा सरकार की कब्र खोद दी। यह अच्छा संकेत है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पद सम्हालते ही प्रशासनिक सर्जरी शुरू कर दी और कामकाज का हिसाब माँगना शुरू किया। दरअसल पाँच-पाँच साल की लगातार तीन पारियाँ खेल चुकी रमन सरकार के उन तमाम बड़े फैसलों एवम् कार्य योजनाओं की समीक्षा की जानी चाहिए जिन पर अरबों रूपए खर्च हुए हैं। कांग्रेस को बड़ी उम्मीदों के साथ जनता ने राजसत्ता सौंपी है। पाँच साल चुनौतियों से निपटने भले ही नाकाफी हो, पर आमजनों का विश्वास बनाए रखने के लिए यह पर्याप्त है। जरूरी है सरकार पारदर्शिता, संवेदनशीलता एवम् वैचारिकता का आदर करते हुए काम करें। क्या भूपेश बघेल सरकार एक माह में ही दिखाई पड़ी तेज गति की निरंतरता को कायम रख पाएगी? सवाल बड़ा है पर उम्मीद भी कम नहीं।