- दिवाकर मुक्तिबोध

छत्तीसगढ़ में किसकी सरकार बनेगी? भाजपा की या कांग्रेस की? दस दिसंबर तक न थमने वाली इन चर्चाओं के बीच केवल एक ही बात दावे के साथ कही जा सकती है कि भाजपा के राष्ट्रीय अधयक्ष अमित शाह का मिशन 65 प्लस औंधे मुँह गिरने वाला है। उन्होंने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष व राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह को विधान सभा चुनाव में कुल 90 में से 65 से अधिक सीटें जीतकर लाने का लक्ष्य दिया था जो किसी भी सूरत में पूरा होते नहीं दिख रहा है। 11 दिसंबर को मतों की गिनती होगी और नई सरकार का चेहरा स्पष्ट हो जाएगा। अभी लोगों की जिज्ञासा तीन सवालों पर केन्द्रित है - सरकार किसकी बनेगी? बीजेपी की या कांग्रेस की? जोगी कांग्रेस - बसपा गठबंधन क्या गुल खिलाएगा? या त्रिशंकु की स्थिति में क्या होगा? 12 व 20 नवंबर को मतदान की प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद बहुसंख्य लोगों का मानना है कि इस बार परिवर्तन की आहट है और मतदाताओं ने इसके पक्ष में वोट किया है। यानी कांग्रेस एक मजबूत संभावना है। अनुमानों के इस सैलाब पर यकीन करें तो भाजपा सत्ता गँवाते दिख रही और यदि ऐसा घटित हुआ तो छत्तीसगढ़ की राजनीति एक नई दिशा की ओर आगे बढ़ेगी जो अगले 6 माह में होने वाले लोकसभा चुनाव को यकीनन प्रभावित करेगी।

जैसा कि पहले कई बार कहा गया है कि 2018 के चुनाव अनेक अर्थों में पिछले तीन चुनावों के मुकाबले भिन्न होंगे। और हुआ भी ऐसा ही। 2018 का चुनाव एक अलग तरह का चुनाव हुआ, बेहद कश्मकश और रोमांच से भरपूर जिसके नतीजे जानने की अपार उत्सुकता लोगों को बेचैन कर रही है। दरअसल इस चुनाव के बारे में सोचने के लिए लोगों के पास काफ़ी मुद्दे थे। एक तथ्य यह कि एक ही पार्टी के 15 वर्षों के शासन से जनता ऊबने लगी थी। इसे बढ़ावा मिला सरकार के कामकाज से , निरंकुश नौकरशाही से और भयानक भ्रष्टाचार से। आम आदमी का, गरीबों का छोटे से छोटा काम भी बिना पैसे दिए पूरा नहीं हो सकता था। सरकार में व्याप्त रिश्वतख़ोरी से जनता तंग थी। नौकरशाही पर लोकतान्त्रिक तरीके चुने गए जन-प्रतिनिधियों का कोई प्रभाव नहीं था बल्कि यह कहना अधिक बेहतर होगा कि नौकरशाहों को मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों, विधायकों की परवाह नहीं थी। यह चर्चा आम रही है कि वस्तुत: सर्वोच्च पदों पर विराजमान तीन-चार अफसर ही सरकार चला रहें थे। महत्वपूर्ण फैसले वे ही लेते थे। लगभग पूरा मंत्रिमंडल इनके हाथों की कठपुतली बना हुआ था। भाजपा कार्यकर्ताओं ने बंद कमरों में हुई बैठकों में नौकरशाहों की मनमानी व जन-प्रतिनिधियों की उपेक्षा के खिलाफ अनेक बार नाराजगी जाहिर की थी। पर हर बार बात आई गई हो गई। नतीजतन भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ नौकरशाहों का यह चेहरा पार्टी की संभावनाओं पर भारी पड़ता नजर आ रहा है। तीन दर्जन कर्मचारी संगठन जिसमें तमाम सरकारी कर्मचारी, शिक्षक, राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी व चतुर्थ वर्ग के कर्मचारी शामिल है, आईएएस अफसरों के ढुल-मुल रवैये से खफा रहे। तथा इसे वे वृहत आंदोलनों के ज़रिए व्यक्त करते रहे। उनके असंतोष को देखते हुए इस बात की प्रबल संभावना है कि इस बार भाजपा को करीब 7 लाख सरकारी कर्मचारियों व उनके परिजनों का साथ नहीं मिला और उन्होंने सरकार के खिलाफ वोटिंग की। सरकारी कर्मचारियों के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी को किसानों व आदिवासियों की भी नाराजगी झेलनी पड़ी। इसका फ़ायदा कांग्रेस को मिलता दिख रहा है। वैसे भी राज्य की 29 एसटी आरक्षित सीटों पर पिछले चुनाव में कांग्रेस का वर्चस्व रहा हैं और माना जा रहा है कि इस बार भी इन क्षेत्रों में पिछले परिणाम का दोहराव होने वाला है। इनके अलावा और भी कुछ नीतिगत फैसले थे, जिनमें नोटबंदी व जीएसटी जैसे आर्थिक मुद्दे भी शामिल है, और जिसकी वजह से व्यापारी समुदाय भी असंतुष्ट है, सरकार के खिलाफ गए है। कुल मिलाकर व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश एक बड़ी वजह है जो बदलाव की मतदाताओं की मन:स्थिति को और पुख्ता करती है।

इस चुनाव में कांग्रेस की तैयारियां पूर्वापेक्षा बेहतर रही है। लेकिन उसे सबसे ज्यादा लाभ एंटीइनकमबेंसी का मिलता दिख रहा है। यानी नकारात्मक वोट जो ज्यादातर कांग्रेस के पक्ष में गए होंगे। पार्टी स्तर पर भी एक और फर्क महसूस किया गया है। वह है इस दफे अतिरिक्त सावधानी व निगरानी। मतदान के बाद ईवीएम मशीनें सुरक्षित जगहों पर पहुँचा दी गई तथा चौबीसों घंटे निगरानी के लिए पहरा बिठा दिया गया लेकिन सुरक्षा की तगड़ी यवस्था के बावजूद कांग्रेस व अन्य दलों ने अपने कार्यकर्ताओं की ड्यूटी इस आशंका के चलते लगाई कि मतपेटियों के साथ छेड़-छाड़ की जा सकती है या उन्हें बदला जा सकता है। प्रशासनिक व्यवस्था पर ऐसा संशय पहले कभी नहीं था किंतु कांग्रेस का मानना है कि पलटी हुई बाजी जीतने के लिए भाजपा कुछ भी कर सकती है। इस संदर्भ में पिछले चुनाव को याद किया जाता है जब मतगणना का अंतिम राउंड शुरू होने से पहले बहुमत को आते देख कांग्रेस ने जीत की खुशी में जश्न मनाना शुरू कर दिया था व भाजपा कार्यालय में मुर्दनी छा गई थी। पर आखरी दौर की मतगणना के ख़त्म होते ही दृश्य बदल गया। कांग्रेस जीतते-जीतते हार गई। लिहाजा इस बार वह चुनाव मोर्चे पर अधिक मुस्तैदी के साथ डटी हुई है।

भाजपा ने भी यद्पि कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन उसमे एक खामी यह नजऱ आई कि प्रदेश नेतृत्व पर भरोसा नहीं किया गया। उसे किनारे करके राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के हिसाब से चुनाव की बाजी सजाई गई। टिकिट वितरण से लेकर चुनाव से संबंधित हर विभाग में उनका दखल रहा। ऐसा लग रहा था, चुनाव रमन सिंह नहीं, अमित शाह लड़ रहे हैं। इसका परिणाम नेताओं व कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ा और वह कितना तीव्र था, इसका खुलासा 11 दिसंबर को हो जाएगा। यदि भाजपा सत्ता गवांती है तो इसका एक कारण नेतृतव के हाईजैक को माना जाएगा। हालाँकि मुख्यमंत्री रमन सिंह आश्वस्त हैं कि मिशन 65 प्लस का लक्ष्य हासिल होगा। पर कैसे? अभी भाजपा के किसी भी नेता के पास इसका कोई जवाब नहीं है। सब सवाल हवा में है और नेताओं से लेकर नागरिक तक, हर कोई इन्हें लपककर अपना गुणा-भाग कर रहा है।