रायपुर। 30 जनवरी 1948...वही दिन है जब महात्मा गांधी की हत्या की गई थी। नाथूराम गोडसे ने अपने दो साथियों के साथ मिलकर इस कांड को अंजाम दिया था। यूं तो समूचे घटनाक्रम और गांधी-गोडसे को लेकर बहुत कुछ कहा-सुना जा चुका है, लेकिन यह जानना रोचक होगा कि आखिर हत्याकांड को अंजाम देने से पहले दोषियों के जेहन में क्या चल रहा था?

मालूम हो, कुछ दिन पहले ही बम धमाका कर बापू को मारने की नाकाम कोशिश हुई थी। गोडसे एंड कंपनी का एक साथी पकड़ा भी जा चुका था। उस नाकामी से सबक सीखने के बाद अब गांधी की हत्या की कमान गोडसे और दो अन्य ने अपने हाथों में ले ली थी। ये थे- नारायण आप्टे और विष्णु करकरे। आप्टे को पहले ही दिल्ली भेज दिया गया। गोडसे-करकरे को पिस्तौल का बंदोबस्त करना था। यह 25 जनवरी की बात है।



27 जनवरी को तीनों दिल्ली में मिले, लेकिन पिस्तौल का बंदोबस्त न हो सका था। तीनों ने वहां शरणार्थी शिविर खंगाल डाले कि कहीं किसी के पास पिस्तौल मिल जाए, लेकिन मायूसी हाथ लगी।

इसके बाद गोडसे ने आखिरी दांव खेला। वह करकरे को लेकर मध्यप्रदेश के ग्वालियर आया, जहां वैद्य दत्तात्रेय परचुरे रहता था। परचुरे किसी जमाने में गोडसे का बहुत पक्का दोस्त था। आखिरकार पिस्तौल मिल गई। कागज के थैले में बंद, पुराने कपड़ों में लिपटा, काले रंग का एक आटोमैटिक बेरेटा पिस्तौल, जिसका नंबर था- 606824-पी। गोडसे-करकरे की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। दोनों फिर दिल्ली रवाना हुए।

29 जनवरी की शाम तीनों पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्रतीक्षालय रूम में आराम फरमा रहे थे। तय हो चुका था कि 30 जनवरी की शाम 5 बजे बिड़ला हाउस में प्रार्थना के समय गांधी की हत्या कर दी जाएगी। गोडसे ने आगे रह कर कहा था कि यह काम सिर्फ मैं करूंगा, बाकी दो उसकी मदद करेंगे।

रात होने से पहले तीनों ने शानदार दावत उड़ाने का फैसला किया। उन्हें पता था कि सब कुछ योजना के मुताबिक हुआ तो यह साथ दावत उड़ाने का आखिरी मौका होगा। तीनों नीचे उतरकर भीड़ में चलने लगे। तय हुआ कि ब्रेण्डोन होटल जाया जाएगा, लेकिन वहां जाकर पता चला कि वहां सभी साथ खाना नहीं खा सकेंगे, क्योंकि करकरे शाकाहारी है। तीनों एक-दूसरे के गले में हाथ डालकर आगे बढ़े और किसी अन्य बढ़िया होटल में खाना खाया।

तीनों के चेहरे पर कोई तनाव नहीं था। खासतौर पर गोडसे बिल्कुल शांत था। खाना खाने के बाद गोडसे फिर रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में आ गया और बाकी दो फिल्म देखने चले गए। हालांकि इंटरवल में ही बाहर आ गए।

अगले दिन सुबह तीनों जल्दी उठे और अपनी योजना को पुख्ता करने में जुट गए। शाम को गोडसे ने योजना के मुताबिक बापू की हत्या कर दी।