खंडवा। मध्यप्रदेश के खण्डवा जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित एक गाँव के मिडिल स्कूल में शिक्षकों की कमी की जितनी चिंता सरकार और प्रशासन के नुमाइंदों को होनी चाहिए, उससे कहीं ज्यादा वहां के ग्रामीणों को है। यही कारण है, कि साधारण तरीके से शिक्षकों की मांग करते-करते थक चूके ग्रामीणों ने आक्रोशित होकर अपने बच्चों को अब स्कूल भेजना बन्द कर दिया है। 

यह मामला खंडवा जिले के छैगांव माखन ब्लॉक के मिडिल स्कूल मिर्जापुर-भोंडवा का है। इस मिडिल स्कूल में कक्षा 6 से कक्षा 8 तक लगभग 80-90 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। जानकर हैरानी होगी, कि इन बच्चों को पढ़ाने के लिए एक भी शिक्षक नही है। बताया जाता है, कि खानापूर्ति के लिए प्राइमरी स्कूल की एक शिक्षिका को यहां ज़रूर तैनात किया गया है, लेकिन वह भी यहां पूर्णकालिक नही है, बल्कि प्रभार में है। 

मिर्जापुर-भोंडवा के ग्रामीणों का कहना है, कि जिस महिला शिक्षिका को प्राइमरी स्कूल से हटाकर मिडिल स्कूल में रखा गया है, वह भी बच्चों को नही पढ़ाती है। वह ज्यादातर समय अपने खुद के छोटे बच्चे को सम्हालने में लगाती है, या फिर बेपरवाह होकर किचन में रहती है। इन सबसे टाइम बच भी गया, तो वह नियमित जानकारी तैयार करने में जुट जाती है। यानी, कुल मिलाकर, बच्चों के अध्यापन के लिए ना तो यहां शिक्षक हैं, ना ही किसी को इसकी परवाह है। सभी को अपनी खानापूर्ति की चिंता है। इसलिए ग्रामीणों ने अपने बच्चों को स्कूल भेजना बन्द कर दिया है। 

वैसे पूरे मध्यप्रदेश में स्कूलों का हाल कमोबेश यही है, जो मिर्जापुर भोंडवा के मिडिल स्कूल का है। लेकिन, बाकी ज्यादातर जगहों पर अतिथि शिक्षकों ने आबरू पर पर्दा कर दिया है, इसलिए सरकार को लगता है, कि उसका राजपाठ सब-कुछ ठीक चल रहा है।

फिर ऐसे में, मिर्ज़ापुर भोंडवा के इस विवादित मिडिल स्कूल में अतिथि शिक्षक क्यों नही रखे गए...? इस सवाल का सही जवाब तो हालांकि कोई नही दे पा रहा है। लेकिन सूत्रों ने जो जानकारी दी है, उससे साबित होता है, कि 

इस मामले से जुड़े सारे लोगों ने कैसी लापरवाही की है। बताया जाता है, कि अतिथि शिक्षक नियुक्ति से पहले ऑनलाइन पोर्टल में रिक्तियां दर्ज करने के लिए सभी स्कूलों से जानकारी मंगाई गई थी, उस समय वहां पदस्थ शिक्षिका छुट्टी पर थी। इसलिए रिक्तियों की जानकारी नही दी गयी, और इसके कारण वहां अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति नही हो पाई। 

अब सबसे बड़ा सवाल ये है, कि जिस स्कूल में एकमात्र शिक्षिका है, उसे एक झटके में छुट्टी देने वाला प्रिंसिपल कौन है..?? 

अगर प्रिंसिपल ने छुट्टी दे भी दी, तो तो फिर पोर्टल के लिए रिक्तियों की जानकारी देने की जिम्मेदारी खुद क्यों नही पूरी की..?

मानाकि, शिक्षिका और प्रिंसिपल दोनो ने इस बात को गंभीरता से नही लिया, तो क्या बीईओ साहब जैसे लोग भी घोड़े बेचकर सो रहे थे..???

बेहद साफ है, कि शिक्षकों की पर्याप्त व्यवस्था नही होना सरकार के स्तर की बात है। लेकिन, मिर्जापुर भोंडवा का मामला स्थानीय स्तर की लापरवाही है। 

छुट्टी पर जाने से पहले उस शिक्षिका ने रिक्तियों की जानकारी अपने प्रिंसिपल को दे दी होती, या छुट्टी देना जरूरी था तो प्रिंसिपल ने खुद भी यह जानकारी मुख्यालय को दी होती, तो आज ग्रामीणों के सामने सरकार के सामने ऐसी फ़ज़ीहत नही होती। 

और, हैरानी तो इस बात की भी है कि उस छोटे से गाँव में ऐसी शर्मनाक नौटंकी पिछले लगभग हफ्ते भर से हो रही है। ग्रामीणों का आक्रोश एक सा नही होता, ये बात सभी जानते हैं। कुछ लापरवाह शिक्षक होते होंगे, लेकिन कई सभ्य और शिष्ट भी होते हैं, लेकिन नशे की लत से अभ्यस्त ग्रामीण सभी के सामने सरकार की ऐसी-तैसी करने जैसी अशिष्ट भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। ऐसे में, नियम-कायदों से अंजान कुछ ग्रामीण हाई-स्कूल और हायर-सेकेंडरी के टीचर्स पर दबाव बना रहे हैं, कि मिडिल स्कूल में भी वही पढ़ाएं और हाई-हायर में भी। 

कुल मिलाकर, खंडवा जिले के एक स्कूल की लापरवाही ने जबरन निर्दोषों को भी तकलीफ सहने के लिए मजबूर कर दिया है। 

वास्तविक जिम्मेदार शिक्षिका और प्रिन्सिपल पर फिलहाल कोई कार्रवाई नही हुई है, ना ही ग्रामीणों की मांग पूरी हुई है।