By प्रेमकुमार मणि 

नागपुर जिला परिषद् के चुनावों में भाजपा के हारने और कांग्रेस के जीतने की खबर है। समाचारों के अनुसार जिला परिषद् के कुल 54 सीटों में से 31 पर कांग्रेस ने जीत हासिल की है। स्थानीय निकाय के चुनाव नतीजों  से किसी राजनैतिक बदलाव का आकलन करना शायद सही नहीं होगा, लेकिन जनता के बदलते मनोभावों को इसके द्वारा समझा जा सकता है।

नागपुर महाराष्ट्र की दूसरी राजधानी  है, और भारत देश का भौगोलिक रूप से केंद्र स्थल भी। इसके महत्व को देखते हुए ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपना मुख्यालय यहाँ बनाया था। इसके कुछ ही साल बाद 1932 में  गांधीजी ने भी खुद को साबरमती से वर्धा में शिफ्ट कर लिया। वर्धा आश्रम नागपुर से कोई साठ किलोमीटर पर अवस्थित है। यहाँ आज गांधीजी  के नाम पर ही एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का हिंदी विश्वविद्यालय भी है। अम्बेडकर ने भी अपनी धर्म -दीक्षा केलिए नागपुर को ही चुना तो इसके पीछे उनके मन में अवश्य कोई बात रही होगी।

शायद सांस्कृतिक रूप से नागपुर नाग जाति-समुदाय का केंद्र रहा होगा। नागों की एक विकसित संस्कृति थी, जो आर्य संस्कृति से भिन्न थी। उनकी अलग जुबान भी थी। आज का  झारखण्ड पुराना छोटा नागपुर है, और इस तरह नागपुर और छोटा नागपुर में एक अंतर्संबंध बनता है। 

मैंने कई दफा नागपुर की यात्रा की है। बगल के जिले यवतमाल में भी कई जगहों पर गया हूँ और सार्वजानिक सभाओं को सम्बोधित किया है। वह हिंदी भाषी इलाका है और वहां से एक हिंदी अख़बार लोकमत समाचार भी प्रकाशित होता है, जिसमें कुछ वर्ष पूर्व तक मैं लिखता था।

यह इलाका सामाजिक -सांस्कृतिक रूप से जागरूक रहा है और राजनैतिक रूप से भी। वामपंथियों -समाजवादियों की उस इलाके में अच्छी -खासी पैठ थी। जोतिबा फुले, अम्बेडकर, बाबा गाडगे आदि वहां खूब जाने जाते हैं। गाँव -गाँव में इन सब के स्मारक और मूर्तियां हैं। नागपुर की दीक्षाभूमि गांधी शांति प्रतिष्ठानों की तरह सुस्त - मृतप्राय जगह नहीं है। वहां हर समय चहल -पहल बनी रहती है, लोगों का आना -जाना लगा रहता है। 

मगर इतना तो कहा ही जायेगा कि हाल के वर्षों में उस इलाके का पर्याप्त भगवाकरण हो गया था। नागपुर से ही नितिन गडकरी और देवेंद्र फडणवीस जैसे भाजपा के दिग्गज नेता  हैं। दोनों की जड़ें आरएसएस में है।

ऐसे में इस इलाके से भाजपा की हार के कुछ अर्थ तो हैं ही। यह सुनकर अजीब लगा कि नितिन गडकरी के पैतृक गाँव धापेवाड़ा में भी भाजपा बुरी तरह पिट गयी। वहां कांग्रेस को सफलता हासिल हुई है। आरएसएस के मुख्यालय में भाजपा की इस पराजय के कुछ मतलब तो अवश्य हैं। यह दीपक तले अँधेरा नहीं है। इसे केंद्र अथवा मुख्यालय  से विद्रोह या विस्फोट कहा जाना चाहिए।

प्रेम कुमार मणि दलित चिंतक और साहित्यकार हैं।

(प्रस्तुत लेख में व्यक्त किये गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं।)