ओपिनियन

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By पीयूष कुमार

 

गोटूल को केंद्र बनाकर समकालीन बस्तर की यह असाधारण कहानी इस उपन्यास (फिक्शन) में जाहिर हुई है। कोयतोर (गोंड) समाज और उसकी समृद्ध संस्कृति का केंद्र हैं गोटूल। इस उपन्यास का शीर्षक 'येरमिहतना' एक गोटूल के नाम पर है जिसका शाब्दिक अर्थ है, 'मां के हाथों शिशु का प्रथम स्नान'। यह स्नान अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसा माना जाता है कि इस स्नान से जीवन ऊर्जायुक्त रहता है। कोयतोर समाज मे गैरजिम्मेदार लोगों को ताना भी मारा जाता है कि इसका 'येरमिहतना' ठीक से नही हुआ है।

उपन्यास की कथा गोटूल में बच्चों की सदस्यता की प्रक्रिया से आरंभ होता है। वहां का वातावरण, दृश्य, लोग और प्रक्रियाएं अत्यंत मनोरम, जीवंत और सुंदर वर्णित है। पाठक कब अपनी दुनिया से उस दुनिया मे चला जाता है पता ही नहीं चलता। विशेष बात यह है कि इस सामाजिक व्यवस्था को बताते हुए उपन्यास उसमे अन्य पात्रों के साथ व्यवस्था के सभी उद्देश्यों के कार्य कारण संबंधों को भी उद्घाटित करता जाता है।

कोयतोर व्यवस्था की यह शानदार गाथा आगे चलकर समकालीन वर्तमान संदर्भों से जुड़ती है और उसका समग्र विश्लेषण करती हुई अपने क्लाइमेक्स तक पहुचती है। क्लाइमेक्स इतना जीवंत है कि लगता है कोई फ़िल्म चल रही हो। जब उपन्यास खत्म होता है तो मन मे एक अवसाद छा जाता है। प्रकृति विरुद्ध किये गए कार्यों पर पछतावे और कथानक में अकेली रह गयी नायिका कोयना के दुःख के साथ मन एक ऐसे भावलोक में चला जाता है जहां प्रतीत होता है कि भौतिक रूप से सभ्य होकर मनुष्य ने क्या पाया।

यह उपन्यास गोटूल के माध्यम से बस्तर की कोयतोर संस्कृति जो गोंड आदिवासी संस्कृति के नाम से प्रचलित है, उसकी वह अद्भुत जानकारी देता है जो आज तक कहीं लिखी और सुनी न गयी। कोयतोर उत्पत्ति, विकास और प्राकृतिक सहअस्तित्व को तार्किक और वैज्ञानिक तरीके से इस गाथा में समाहित किया गया है। धर्म और उसकी वह प्रकृति जिसने मनुष्य के बीच दूरियां पैदा की हैं, नक्सली हिंसा और उसके दमन के बीच फंसे आदिवासी, भौतिक विकास के दुष्प्रभाव, जनजातीय क्षेत्रों के संवैधानिक अधिकारों की बातें भी उपन्यास की मूल कथा के समानांतर चलती हैं। यह शैली शायद ही पहले किसी हिंदी उपन्यास में प्रस्तुत हुई हों।

उपन्यास का शिल्प बहुत अच्छा है। विभिन्न स्तरों पर बात करते हुए भी उपन्यास कहीं उलझन में नही डालता। गोटूल का चित्रण अत्यंत कमनीय और महनीय है। कथा में भावशिल्प सघन है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। बीर और कोयना का अव्यक्त प्रेम, अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान भाव, माता-पिता विहीन बालक जीमा की कसक या गायता की निर्मम हत्या, मन विचलित कर देते हैं।

अपनी मौज में रहनेवाले बस्तर के आदिवासियों पर आयातित भौतिक सभ्यता ने किस कदर दुष्प्रभाव डाला है, उसका आईना है यह उपन्यास। यह चिंतन करने को विवश करता है कि संसाधनों का दोहन करके, प्रकृति का नाश करके, वास्तविक सुख नही पाया जा सकता। समकालीन विश्व को देखकर सचमुच प्रतीत होता है कि इसका 'येरमिहतना' ठीक से नही हुआ है... 

174 पृष्ठों का यह उपन्यास 'कोया पुनेम संगत' ने लिखा है। इसका मूल्य 200 रुपये है और यह अमेजन में इस लिंक पर उपलब्ध है। 

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By मो.सज्जाद खान

 

त्तीसगढ़ मे पंद्रह वर्षों से पूर्व बीजेपी सरकार रही। वहीं, वर्तमान कांग्रेस सरकार सत्ता के शिखर पर पंद्रह साल के वनवास के बाद यहीं उम्मीदों के सहारे सरकार बनाने में सफल हुई है कि आम नागरिकों की जमीनी स्तर की व्यवस्था और जरूरत मंद गरीब आम आदमी की मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था करने के लिए आई है। मेरा उद्देश्य किसी प्रकार की जख्मों को उधेड़ना नहीं है ना ही इसमें मेरा किसी भी प्रकार की  स्वार्थ हैं। मेरा उद्देश्य समाज से जुड़े हुए जन समस्याओं को शासन प्रशासन का ध्यान आकर्षित करवाना है।

आजाद भारत को आजाद हुए 61 वर्ष होने जा रहे हैं। लेकिन अभी तक पूर्ण रूप से जमीनी हकीकत नहीं बदली। आज फिर वहीं नजारा मुझे देखने को मिला आज सरकारें बदलती हैं। सत्ता परिवर्तन होता है। बस रह जातीं है बदहाली। समाज में ऐसी अव्यवस्थाओं को देखता हूं, तो मेरी आत्मा दुखी हो जाती है। आज मैंने फिर प्रदेश के जनप्रतिनिधियों, स्कूलों के अध्यापकों, कानून के नुमाइंदों और स्कूलों के अध्यापकों, ट्राफिक व्यवस्था को दुरुस्त करने वाले पुलिस प्रशासन का ध्यान इस सिस्टम सुधारने के लिए मैं प्रदेश के सभी समाचार पत्रों के माध्यम से इस जनहित एवं सामाजिक मुद्दे को दूर तक उठाना चाहता हूँ। आखिर कैसे हो पायेगा बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ अभियान सफल, कैसी हो पायेगी मासूम बच्चियों की सुरक्षा व्यवस्था।

प्रदेश में आखिर कब तक नौनिहालों मासूम स्कूली बच्चों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ होते रहेंगे। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के रखरखाव बेहतर बनाने के लिए स्कूल अध्यापकों और शासन प्रशासन द्वारा अनगिनत बार बच्चों के सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अभियान चलाया जाता है। लेकिन मासूम बच्चों के प्रति बेहतर जागरूकता अभियान माकूल व्यवस्था अभी भी नहीं दिखाई देती। मैने सोचा कि अब कुछ समय के लिए, जमीनी हकीकत से वाकिफ होने के लिए अपने जज्बातों को दफन कर दूं, लेकिन इत्तेफाक ऐसा हो ना सका, परिस्थितियाँ मेरे सामने आकर खड़ी हो गई। मेरी नजरों से हर रोज सुबह शाम अनेक प्रकार की जीवनशैली गुजरती हैं। जिसमें विभिन्न प्रकार अजीबोगरीब व्यवस्थाएं नजर आती हैं।

सामाजिक संस्था से जुड़े होने की वजह से हर पहलुओं पर नजर रखता हूँ। इसी व्यवस्थाओं में मैंने पाया कि बचपन जिंदगी का बहुत ही खूबसूरत सफर होता है। ना कोई चिंता होती हैं। न कोई फिक्र, होती हैं। एक निश्चित जीवन का भरपूर आनंद लेना ही बचपन होता हैं। लेकिन कुछ बच्चों के बचपन में ही लाचारी गरीबी की नजर लग जाती हैं। जिस कारण से उन्हें अपनी ख्वाहिशों को दबानी पड़ती हैं। आज भी समाज में गरीबी एवं मूलभूत सुविधाओं के अभाव के चलते हुए भी अपने बच्चों को पढ़ाने लिखाने के लिए दिल में हौसला जज्बा रखते हैं। बस चाहिए तो इन्हें भविष्य के लिए माकूल व्यवस्था।

आप देख रहे होगें एक व्यक्ति अपने बच्चों के साथ अपने दैनिक संसाधन के हिसाब से किस प्रकार चलित मालवाहक ठेले पर बैठाकर मजदूर अपने बच्चों को स्कूल ले जा रहा है। उस व्यक्ति के कितने अरमान और  सुनहरे भविष्य का सपना सजाया होग। आज ऐसे ही लोगों को चाहिए उनके प्रतिभाओं का प्रोत्साहित करना। इन्हें शासकीय योजनाओं का लाभ मिल सके, जिससे अपने परिवार का समूचित व्यवस्था कर सके।

अभी भी प्रदेश के सुदूर इलाके गांव वनांचलों शहर के शासकीय स्कूलों मे अधिकतर शिकायते समाचार पत्रों के द्वारा पढ़ने मे मिलती हैं। इस लिए ऐसी शासकीय स्कूलों की दुर्दशा दुरूस्त होना अति आवश्यक है। जिसमें हर वर्ग हर समाज गरीब अमीर के बच्चोँ को अच्छी शिक्षा मिले। गरीबी अमीरी की दूरियां मिट सके। सभी के बीच समानता हो। भेदभाव की खाई पट सके। आज हर प्राईवेट स्कूलों मे मोटी फीस देकर के पढ़ने भेज रहे हैं। अधिकतर अभिभावक भी परिवहन व्यवस्था से समझौता करके बच्चों की सुरक्षा उदासीन नजर आ रहे हैं।

कई निजी स्कूल टाटा मैजिक वेन को स्कूल वाहन के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। गरीब परिवार के लोग अधिकतम सीमा से ज्यादा फीस होने के वजह से अपने बच्चों को दाखिला कराने में असमर्थ हैं। सामाजिक संस्था अवाम हिन्द सोशल वेलफेयर कमेटी रामनगर रायपुर सामाजिक एवं जनहित मुद्दों को लेकर सरकार से विनम्र निवेदन करती हैं कि  सरकार को चाहिए कि शासकीय महाविद्यालयों स्कूलों को बेहतर रखरखाव बनाने के लिए समूचित व्यवस्था की जानी चाहिए।

 (लेखक मो.सज्जाद खान सामाजिक संस्था अवाम-ए-हिन्द सोशल वेलफेयर कमेटी रामनगर रायपुर के संस्‍थापक हैं, और प्रस्‍तुत लेख में उनके विचार हैं।)

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