ओपिनियन

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By मो.सज्जाद खान

 

त्तीसगढ़ मे पंद्रह वर्षों से पूर्व बीजेपी सरकार रही। वहीं, वर्तमान कांग्रेस सरकार सत्ता के शिखर पर पंद्रह साल के वनवास के बाद यहीं उम्मीदों के सहारे सरकार बनाने में सफल हुई है कि आम नागरिकों की जमीनी स्तर की व्यवस्था और जरूरत मंद गरीब आम आदमी की मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था करने के लिए आई है। मेरा उद्देश्य किसी प्रकार की जख्मों को उधेड़ना नहीं है ना ही इसमें मेरा किसी भी प्रकार की  स्वार्थ हैं। मेरा उद्देश्य समाज से जुड़े हुए जन समस्याओं को शासन प्रशासन का ध्यान आकर्षित करवाना है।

आजाद भारत को आजाद हुए 61 वर्ष होने जा रहे हैं। लेकिन अभी तक पूर्ण रूप से जमीनी हकीकत नहीं बदली। आज फिर वहीं नजारा मुझे देखने को मिला आज सरकारें बदलती हैं। सत्ता परिवर्तन होता है। बस रह जातीं है बदहाली। समाज में ऐसी अव्यवस्थाओं को देखता हूं, तो मेरी आत्मा दुखी हो जाती है। आज मैंने फिर प्रदेश के जनप्रतिनिधियों, स्कूलों के अध्यापकों, कानून के नुमाइंदों और स्कूलों के अध्यापकों, ट्राफिक व्यवस्था को दुरुस्त करने वाले पुलिस प्रशासन का ध्यान इस सिस्टम सुधारने के लिए मैं प्रदेश के सभी समाचार पत्रों के माध्यम से इस जनहित एवं सामाजिक मुद्दे को दूर तक उठाना चाहता हूँ। आखिर कैसे हो पायेगा बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ अभियान सफल, कैसी हो पायेगी मासूम बच्चियों की सुरक्षा व्यवस्था।

प्रदेश में आखिर कब तक नौनिहालों मासूम स्कूली बच्चों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ होते रहेंगे। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के रखरखाव बेहतर बनाने के लिए स्कूल अध्यापकों और शासन प्रशासन द्वारा अनगिनत बार बच्चों के सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अभियान चलाया जाता है। लेकिन मासूम बच्चों के प्रति बेहतर जागरूकता अभियान माकूल व्यवस्था अभी भी नहीं दिखाई देती। मैने सोचा कि अब कुछ समय के लिए, जमीनी हकीकत से वाकिफ होने के लिए अपने जज्बातों को दफन कर दूं, लेकिन इत्तेफाक ऐसा हो ना सका, परिस्थितियाँ मेरे सामने आकर खड़ी हो गई। मेरी नजरों से हर रोज सुबह शाम अनेक प्रकार की जीवनशैली गुजरती हैं। जिसमें विभिन्न प्रकार अजीबोगरीब व्यवस्थाएं नजर आती हैं।

सामाजिक संस्था से जुड़े होने की वजह से हर पहलुओं पर नजर रखता हूँ। इसी व्यवस्थाओं में मैंने पाया कि बचपन जिंदगी का बहुत ही खूबसूरत सफर होता है। ना कोई चिंता होती हैं। न कोई फिक्र, होती हैं। एक निश्चित जीवन का भरपूर आनंद लेना ही बचपन होता हैं। लेकिन कुछ बच्चों के बचपन में ही लाचारी गरीबी की नजर लग जाती हैं। जिस कारण से उन्हें अपनी ख्वाहिशों को दबानी पड़ती हैं। आज भी समाज में गरीबी एवं मूलभूत सुविधाओं के अभाव के चलते हुए भी अपने बच्चों को पढ़ाने लिखाने के लिए दिल में हौसला जज्बा रखते हैं। बस चाहिए तो इन्हें भविष्य के लिए माकूल व्यवस्था।

आप देख रहे होगें एक व्यक्ति अपने बच्चों के साथ अपने दैनिक संसाधन के हिसाब से किस प्रकार चलित मालवाहक ठेले पर बैठाकर मजदूर अपने बच्चों को स्कूल ले जा रहा है। उस व्यक्ति के कितने अरमान और  सुनहरे भविष्य का सपना सजाया होग। आज ऐसे ही लोगों को चाहिए उनके प्रतिभाओं का प्रोत्साहित करना। इन्हें शासकीय योजनाओं का लाभ मिल सके, जिससे अपने परिवार का समूचित व्यवस्था कर सके।

अभी भी प्रदेश के सुदूर इलाके गांव वनांचलों शहर के शासकीय स्कूलों मे अधिकतर शिकायते समाचार पत्रों के द्वारा पढ़ने मे मिलती हैं। इस लिए ऐसी शासकीय स्कूलों की दुर्दशा दुरूस्त होना अति आवश्यक है। जिसमें हर वर्ग हर समाज गरीब अमीर के बच्चोँ को अच्छी शिक्षा मिले। गरीबी अमीरी की दूरियां मिट सके। सभी के बीच समानता हो। भेदभाव की खाई पट सके। आज हर प्राईवेट स्कूलों मे मोटी फीस देकर के पढ़ने भेज रहे हैं। अधिकतर अभिभावक भी परिवहन व्यवस्था से समझौता करके बच्चों की सुरक्षा उदासीन नजर आ रहे हैं।

कई निजी स्कूल टाटा मैजिक वेन को स्कूल वाहन के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। गरीब परिवार के लोग अधिकतम सीमा से ज्यादा फीस होने के वजह से अपने बच्चों को दाखिला कराने में असमर्थ हैं। सामाजिक संस्था अवाम हिन्द सोशल वेलफेयर कमेटी रामनगर रायपुर सामाजिक एवं जनहित मुद्दों को लेकर सरकार से विनम्र निवेदन करती हैं कि  सरकार को चाहिए कि शासकीय महाविद्यालयों स्कूलों को बेहतर रखरखाव बनाने के लिए समूचित व्यवस्था की जानी चाहिए।

 (लेखक मो.सज्जाद खान सामाजिक संस्था अवाम-ए-हिन्द सोशल वेलफेयर कमेटी रामनगर रायपुर के संस्‍थापक हैं, और प्रस्‍तुत लेख में उनके विचार हैं।)

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