ओपिनियन

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“हम इस नक्सल घटना की हम कड़ी निंदा करते हैं.” पॉलिटिकल क्लास के पास सिवाय ऐसा कहने के और कुछ है भी नही. जवान जिन मुश्किलों में लड़ाई लड़ रहे हैं, इस क्लास को इस बात की कोई परवाह ही नहीं है.

(सुकमा में हुए नक्सल हमले पर वरिष्ठ पत्रकार आलोक प्रकाश पुतुल की तजवीज़)

माओवादी लगातार यह दावा करते हैं कि वो एक गुरिल्ला लड़ाई लड़ रहे हैं, सरकार भी यही कहती है कि बस्तर एक युद्ध क्षेत्र है, तो युद्ध और गोरिल्ला टैक्टिस को जानने समझने वाले यह बखूबी जानते हैं कि किसी ऐसी घटना का हो जाना किसी की मजबूती को दर्शाने वाला कतई नहीं होता.

माओवादियों को जब भी मौका मिलता है वह ऐसी हरकत कर गुज़रते हैं. दो क़दम आगे और एक क़दम पीछे जैसी उनकी स्ट्रेटजी लगातार चलती रहती है. मामला केवल अवसर और बुनियादी टैक्टिस का है. पखवाड़े भर पहले माओवादी मारे गये और मंगलवार को सीआरपीएफ के जवान. लड़ाई दो तरफ़ा है और हार जीत भी.

यह सही है की बस्तर में नक्सल प्रभावित इलाकों में फोर्स का दबाव बढ़ा है. इस दबाव के चलते नक्सली बैकफुट में है. मगर इस बैकफुट में होने का यह मतलब कतई नहीं है कि नक्सली खत्म हो गए हैं या उनकी हमला करने की ताकत खत्म हो गई है. नक्सली दबाव में हैं और मुठभेड़ की घटनाएं बढ़ रही है.

सुरक्षाबलों के लिये इन मुठभेड़ों में राहत की बात ये है कि पिछले एक डेढ़ साल में अगर गौर किया जाए तो फोर्स पर फर्जी मुठभेड़ के आरोप ना के बराबर लगे हैं. लेकिन सुरक्षाबलों और माओवादियों के बीच मुठभेड या माओवादियों की हिंसक कार्रवाइयों में कहीं कोई कमी आ गई हो, ऐसा नहीं लगता.

सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड और हिंसक घटनाओं के आँकड़ों के बीच लाख टके का सवाल है कि आख़िर ऐसी परिस्थितियाँ क्यों बनती जा रही हैं कि दुनिया में सबसे अधिक संख्या में सुरक्षाबलों की तैनाती के बाद भी बस्तर में माओवादी हिंसा में कहीं कोई कमी नहीं आ पा रही है?

इसका एक जवाब तो यही है कि माओवाद की राजनीति और उसकी ताक़त को या तो हम समझ नहीं पा रहे हैं या समझना नहीं चाहते हैं. दूसरा माओवाद जिन परिस्थितियों में पलता, फलता फूलता और विस्तार पाता है, हम उन परिस्थियाँ को भी एड्रेस कर पाने में असफल रहे हैं.

सरकार बार बार गोली का जवाब गोली से देने की बात करती है और कथित विकास के सहारे अपनी पैठ बनाने का भी दावा करती है. विकास के मोर्चे पर कुछ सराहनीय कोशिशों का दावा सरकार जरुर करती है लेकिन विकास की बुनियादी समझ को भी विस्तारित करने की भी जरुरत है.

बस्तर के आदिवासियों की तो जाने दें, बुनियादी जरुरत का हाल ये है कि माओवादी मोर्चे पर घायल जवानों का इलाज बस्तर तो छोड़िये, राज्य की राजधानी रायपुर में भी संभव नहीं हो पाता. जवानों को हर बार महँगे निजी अस्पतालों में ही भर्ती करना पड़ता है. नक्सलियों की गोली के मुकाबले बस्तर के इलाकों में जवान मलेरिया और डिप्रेशन की वजह से ज्यादा मर रहे हैं. जगदलपुर के महारानी अस्पताल में जवान जमीन पर लेटकर इलाज करवाने के लिए मजबूर होते हैं.

जिस मलेरिया से सबसे अधिक संख्या में जवान प्रभावित होते हैं, उस छत्तीसगढ़ में मलेरिया उन्मूलन का बजट एक तिहाई कर दिया गया है. 2015-16 में केंद्र सरकार ने इस बीमारी के उन्मूलन के लिये राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत 1536.83 लाख रुपये छत्तीसगढ़ को दिया था, 2017-18 में यह आंकड़ा नीचे लुढ़क गया और इस साल केवल 488.20 लाख रुपये इस मद में मिले हैं. ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जो हमारी विकास की समझ पर शक पैदा करते हैं. यह शक कहीं न कहीं हमारे लोकतंत्र पर भी भरोसा घटाने का काम करता है. इस भरोसे को बढ़ाये बिना माओवादियों से निपट पाना आसान नहीं होगा.

1967 में शुरु हुआ माओवादी आंदोलन अगर दो साल में कुचल दिया जाता है तो पचास साल बाद कौन सी परिस्थितियाँ इन्हें पूरे देश में विस्तारित कर देती हैं, इसे समझना कोई राकेट साइंस जैसा मामला नहीं है. लेकिन दुखद है कि हम ऐसी समझ की ज़रूरतों को ख़ारिज करते जाते हैं और माओवादियों से निपटने में हम बार बार असफल साबित हो रहे हैं.

“पत्तियों को काट कर अगर आप पेड़ के ख़त्म हो जाने की ख़ुशफ़हमी पाल रहे हैं तो इससे भला कौन रोक सकता है? लेकिन यह बात हम सब जानते हैं कि पेड को ख़त्म करना है तो उनकी जड़ों पर प्रहार करना होगा. लोकतंत्र की बुनियाद को कमज़ोर करने वाली जड़ों को क्या सरकार सच में काटना चाहती है?”

 

विगत कई वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार, आलोक प्रकाश पुतुल नक्सल वारदातों, सेक्युरिटी फोर्सेस के ऑपरेशन और सरकार की स्ट्रेटेजी की करीबी समझ रखते हैं.

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By पुष्पेन्द्र वैद्य
2 फरवरी 2017 की शाम करीब 7 बजे दफ्तर से घर निकलने की तैयारी कर ही रहे थे कि फोन की घंटी बजी. खबर मिली की गोविंदपुरा थाना इलाके में कोई हत्याकांड का खुलासा हुआ है। कुछ महीन पहले हत्या कर गाडे गए शव को पुलिस खुदाई कर बाहर निकालने घटना स्थल रवाना हो रही है। पूरे दिन की भागमभाग के बाद घर जाते वक्त अचानक आई इस खबर को लेकर पहले सोचा कि कैमरामेन को भेजकर डिटेल्स पता करवा लेता हूँ। लेकिन एक पुलिस अधिकारी से बात करने पर जो जानकारी मिली उससे लगा कि कहानी बडी है।
मुझे खुद ही घटना स्थल पर चलना चाहिए, मैंने तुरंत फैसल किया और हम गोविंदपुरा थाने पहुंचे। थाने से बताया गया कि पुलिस दल पाश इलाके साकेत नगर के इंद्राणी भवन पंहुच रही है जहाँ एक शख्स ने उसकी ही गर्ल फ्रेंड की हत्या कर लाश को दफना दिया है।
हम घर का पता पूछते-पूछते घटना स्थल पंहुचे। पुलिस की गाडियाँ और घर के बाहर लोगों का हुजूम लगा हुआ था। इंद्राणी भवन दो मंजिला मकान था। नीचे की फ्लोर पर प्रजापिता ब्रह्म कुमारी का आश्रम था। इसके ठीक उपर रहता था 25 साल का उदयन दास। कुछ ही महीने पहले यहाँ बंगाल की रहने वाली गर्लफ्रेंड आकांक्षा के साथ लीव-इन रिलेशन में रहता था। पडोसियों के मुताबिक कई दिनों से लडकी दिखी नही।
लडकी के घरवालो की एफआईआर के बाद बंगाल पुलिस पडताल करते हुए भोपाल पंहुची थी। उदयन से सख्ती से पूछताछ कर उसने कबूल किया कि आकांक्षा की हत्या कर उसने शव को घर के ड्राईंग हाल में ही दफना कर उसपर चबुतरा बना दिया था।
बंगाल पुलिस और भोपाल पुलिस घर के भीतर बनी इस कब्र को तुडवा रही थी। तमाशबीन लोगों की भीड जुटी हुई थी। पडोसियों से लेकर ऑटो रिक्शा चलाने वाले तक उदयन के बारे में सिलसिलेवार तरह-तरह की कहानियाँ बयाँ कर रहे थे। दफ्तर को खबर बताई, शाम से रात तक प्राईम टाईम के सभी स्लॉट बुक थे।
वैसे भी कोई क्राईम की इस तरह की खबर इतनी बडी भी नहीं थी कि बाकी की खबरों को रोककर इसे दिखाया जाए। देर रात करीब 2 बजे तक कब्र की खुदाई और तमाम जानकारियों, बाईट और वाकथ्रू-पीटीसी के साथ इस खबर को अपलिंक किया गया। सुबह-सुबह इस खबर ऑन एयर थी।
करीब साढ तीन-चार बजे नींद लगी ही थी कि सुबह 6 बजे की शिफ्ट ने फोन कर जगा दिया। रात का वाकथ्रू तो आ गया लेकिन सुबह की डे-लाईट का एक वाकथ्रू करके तुरंत भेज दो। कैमरामेन को बुलाया और फिर हम घटना स्थल पर पंहुच गए। इस वक्त कई अन्य नेशनल और रिजनल चैनल के रिपोर्टर्स भी यहाँ पीटीसी-वाकथ्रू कर रहे थे। हमने भी अपना काम पूरा किया और फीड भेज दी।
सुबह 6 बजे के बाद लगातार इस खबर को आगे बढ़ाने के लिए आकांक्षा और उदयन से जुडी जानकारियाँ जुटाते और भेजते रहे। शाम होते-होते इस हत्याकांड के कई राज परत-दर-परत खुलते जा रहे थे। रात साढे 8 बजे का स्पेशल शो भी इसी हत्याकांड पर आधारित था। सुबह 6 बजे घर से निकलने के बाद रात दफ्तर में ही बज गई।
अगले ही दिन पुलिस ने एक प्रेस कॉफ्रेंस की जिसमें खुलासा हुआ कि उदयन ने पांच साल पहले रायपुर में अपने माता-पिता की हत्या कर इसी तरह घर के बगीचे में कब्र बना कर दफना दिया था। इस खुलासे के बाद तो यह खबर चैनल में अच्छी खासी जगह बना चुकी थी। उधर खबर में पश्चिम बंगाल और मध्यप्रदेश के बाद छत्तीसगढ पुलिस भी इस इन्वेस्टिगेशन में शामिल हो चुकी थी।
हमने अपने रायपुर के स्ट्रिंगर को अलर्ट किया और उदयन से सम्बंधी जानकारियाँ जुटाना शुरु की मसलन उसका घर, माता-पिता की तस्वीर, उनके परिवार वालों और पडोसियों की बाईट, पुलिस का बयान आदि-आदि। अब भोपाल और कलकत्ता पुलिस उदयन को रायपुर ले जाने की तैयारी कर रही थी। वहाँ भी भोपाल की तरह दो कब्रों को खोदकर माता-पिता के शवों को निकाला जाना था।
हमने अपने दफ्तर को बताया, बॉस ने कहा तुम कातिल उदयन और पुलिस के साथ ही ट्रेन या फ्लाईट जैसे भी जा रहे हों उनके साथ रवाना हो जाओ। नेशनल चैनल के बाकी साथियों में आपस में बात हुई। हम दो नेशनल चैनलों के लोग उस ट्रेन में सवार हो गए जिससे उदयन को रायपुर ले जाना था। रात 11 बजे हम भोपाल स्टेशन पर थे।

हमारा बी-1 कोच उदयन के कोच बी-2 के पास ही था। देर रात हमने चलती ट्रेन में पुलिस और उदयन से बात करने की कोशिश की लेकिन नाकाम हुए। सुबह होते ही हमने फिर अपनी कोशिश शुरु की। पुलिस अफसरों से करीब आधे घंटे चर्चा के बाद वे बात करने के लिए राजी हो गए। बंगाल पुलिस ने आधी अंग्रेज़ी और टूटी-फूटी हिन्दी में हमें कई ऐसी बाते बताई जो अहम थी। पुलिस से इंटरव्यू करने के बाद हमने कातिल उदयन की बर्थ के साथ उसी कोच से हमने वाकथ्रू किया और दफ्तर को भेज दिया।
इस बीच उदयन को चैनलों पर सीरिलय और साईको किलर करार दे दिया गया था। पुलिस अधिकारियों ने हमसे अनौपचारिक बात करते हुए बताया कि आप लोग इसको साईको किलर करार दे रहे हैं लेकिन कानूनन यह शब्द इसे सजा से बचा सकता है। साईको किलर के आधार पर कातिल को कोर्ट से फायदा मिल सकता है।
मीडिया को संजिदा होना चाहिए। कई केस मीडिया ट्रायल की वजह से कमजोर हो जाते हैं और उनका फायदा अपराधियों को मिल जाता है। हमने अपने दफ्तर को भी बताया लेकिन तब तक मीडिया में साईको किलर इस स्टोरी के की वर्ड बन चुके थे। हमारी ट्रेन रायपुर की तरफ दौड रही थी। ट्रेन में किए गए वाकथ्रू, बाईट और विजुअल हेडलाईन में थे। लगातार फोनो से खबर को अपडेट किया जा रहा था।
ट्रेन से उतरकर पुलिस सीधे उदयन को लेकर उसके पुराने मकान पर पंहुची जहाँ उसने माता-पिता को दफनाने की बात कुबूल की थी। रायपुर पुलिस यहाँ जेसीबी मशीन और मजदूरों के साथ तैनात थी। खुदाई शुरू होने के आधे घंटे के भीतर ही उदयन के माता-पिता इंद्राणी देवी और विरेन्द्र दास के शवो की गल चुकी हड्डियाँ उगलना शुरु हो चुकी थी। इस घिनौने कातिल की इस वहशियाना वारदात का कवरेज करते हुए पहली बार हाथ में लिया माईक कांप रहा था। क्या कोई शख्स अपनी ज़रूरतों के लिए इतना भी क्रूर हो सकता है कि जन्म देने वाले माता-पिता को ही इस तरह कत्ल कर अपने मकान के भीतर ही दफना दे।
कातिल उदयन दास के इस घृणित अपराध को लेकर और भी कई चौंका देने वाले तथ्य सामने आए जिन पर बहुत लंबा लिखा जा सकता है। माता-पिता से जुडी कई अहम जानकारियाँ और पूरे घटनाक्रम को मैं होटल के कमरे में बैठकर अपने टीवी स्क्रिन पर देख रहा था। पत्रकारिता के पेशे में ऐसी कई घटनाएँ सामने आती हैं जिन्हें नजदीक से देखने और समझने का मौका मिलता है लेकिन इस घटना ने मुझे कई दिनों तक असहज कर दिया।

 

(पुष्पेन्द्र वैद्य वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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