By योग मिश्र



प्रदेश की संवेदनशील सरकार से नई साँस्कृतिक नीति बनाने एक अपील हम साँस्कृतिक कर्मी करते हैं कि हमारे छत्तीसगढ़ की नई सरकार अपनी सांस्कृतिक नीति में 'क्षेत्रीय थियेटर काम्पलेक्स योजना' शामिल करे और इसे तत्काल अमल में लाएं। इसके अन्तर्गत छत्तीसगढ़ी कला-संस्कृति के विकास के लिए तहसील स्तर पर छोटे-छोटे क्षेत्रीय थियेटर काम्पलेक्स के निर्माण करवाये जाएं।

यह मनोरंजन के लिए आरक्षित भूमि पर जन भागीदारी से भी संभव हो सकता है। थियेटर काम्पलेक्स में मनोरंजन खानपान शिक्षण इंस्ट्युट आदि संचालित होने चाहिए। लेकिन छत्तीसगढ़ी सिनेमा और नाटकों के प्रदर्शन को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। टिकट का संचालन शासन द्वारा हो जिसका एक भाग कर के रूप में सरकार को भी मिले।

थियेटर काम्पलेक्स के मात्र संचालन मेंटेनेंस के लिए हिन्दी फिल्में केवल दो शो 3 से 6 और रात 9 से बारह दिखाये जा सकते हैं , जो छत्तीसगढ़ी सिनेमा व नाटक के प्रदर्शनों से बचे समय पर दिया जाये जिसका प्रदर्शन कभी भी निरस्त किए जाने के लिए बाध्य हो। इन थियेटर काम्पलेक्स में छत्तीसगढ़ी सिनेमा और नाटक के प्रदर्शनों को ही प्राथमिकता दी जाए। और तत्काल प्रभाव से संस्कृति विभाग की पूर्व नियोजित आयोजक की भूमिका पर अंकुश लगाया जाय या पूरी तरह से बंद कर दिया जाय।

संस्कृति विभाग केवल फैसिलेटर की भूमिका में नजर आना चाहिए। एक निश्चित मानदेय कलाकारों को उनकी वरिष्ठता या योग्यता ग्रेड के आधार पर सीधे कलाकार को दिया जाना चाहिए। संस्कृति विभाग के आयोजनों में चली आ रही पंद्रह वर्षों की लूट पर अब तो प्रतिबंध लगे। उस पैसे से क्षेत्रीय थियेटर काम्पलेक्श का निर्माण व संचालन कर अब संस्कृति का पैसा कला संस्कृति के वास्तविक संवर्धन व संरक्षण पर खर्च होना चाहिए। आयोजन के लिए ही संस्कृति का धन नहीं लुटाया जाना चाहिए।

संस्कृति पर होने वाले खर्च का लाभ तभी सुदूर ग्राम में निवास करने वाले हमारे ग्रामीणों तक भी पहुंच पाएगा और इस नीति से संस्कृति का वास्तविक संवर्धन और विकास संभव हो सकेगा। सुदूर गाँव में पनप रही कलाओं को मंच मिलने से ग्रामीण अंचल के युवाओ की प्रतिभा अपनी लोक कलाओं की ओर पुनः लौटने लगेगी। उसे अपने मनोरंजन के लिए शराब या अन्य नशे से बेहतर विकल्प अपने आसपास मिलेगा। ग्रामीण अंचल से पहले की तरह एक से बढ़कर एक कलाकार फिर से सामने आने लगेंगे। धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हमारी नाचा जैसी लोक कलाओं को नई साँसे फिर मिलने लगेंगी।

(लेखक वरिष्‍ठ रंगकर्मी और फिल्‍म निर्देशक हैं)