रायपुर। जलिकट्टू सुनते ही आंखों के सामने बड़े-बड़े सींग वाले सांड़ों की तस्‍वीर सामने आ जाती है। देशभर में मकर संक्रांति के पर्व पर काफी उत्साह देखा गया। उधर तमिलनाडु में पोंगल का त्योहार मनाया जा रहा है। इस दौरान मदुरई में विवादित जल्लीकट्टू खेल का आयोजन किया गया। जल्लीकट्टू के लिए तमिलनाडु सरकार ने इस साल नए नियम-कानून जारी किए हैं। जल्लीकट्टू में हिस्सा ले रहे सभी सांडों के नाम पर टोकन जारी किए जा रहे हैं।



जलीकट्टू का आयोजन करने के लिए प्रदेश सरकार ने कुछ निर्देश जारी किए हैं। इस अवसर पर बुल रेस का आयोजन प्रशासन द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार ही हो रहा है।

प्रतियोगिता में शामिल होने बैलों के लिए टोकन जिलाधिकारी द्वारा जारी किया गया। इन बैलों की रेस को देखने के लिए हजारों की संख्‍या में लोग शामिल हुए।

 

जल्लीकट्टू तमिलनाडु का प्राचीन खेल है। फसलों की कटाई के मौके पर पोंगल के दौरान इसका आयोजन किया जाता है।

 

जल्ली का अर्थ होता है सिक्का और कट्टू का मतलब बांधा हुआ। इसमें भारी-भरकम सांडों की सींगों में सिक्के या नोट फंसाकर रखे जाते हैं और फिर उन्हें भीड़ में छोड़ दिया जाता है।

 

इस प्रतियोगिता में सींगों को पकड़कर सांड पर काबू पाना होता है। सांडों के सींग में कपड़ा बंधा होता है जिसे इनामी राशि पाने के लिए निकालना होता है।

हालांकि पशुप्रेमी इस खेल का लंबे अरसे से विरोध करते रहे हैं।

सांडों को भड़काने के लिए कई बार उनसे हिंसक बर्ताव भी किया जाता है, जिससे वे तेज दौड़ सकें।

जल्लीकट्टू के दौरान कभी-कभी लोगों की जान तक चली जाती है। इसकी तुलना स्पेन के मशहूर खेल बुल फाइटिंग से की जाती है।

हालांकि जल्लीकट्टू के समर्थक कहते हैं कि यह बुल फाइटिंग से अलग है और इसमें हथियारों का भी इस्तेमाल नहीं किया जाता है। साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने एक संगठन की याचिका पर जल्लीकट्टू को प्रतिबंधित कर दिया था, लेकिन बाद में अध्यादेश के जरिए इसके आयोजन का रास्ता साफ कर दिया गया था।