नई दिल्ली। किसी ने सच कहा है मन में अगर हौसला हो तो फिर किसी भी लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। पीवी सिंधू की विश्व खिताबी सफलता के साथ-साथ मानसी जोशी ने भी भारतीय पैरा बैडमिंटन में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज करा लिया है। मानसी ने बासेल में विश्व पैरा बैडमिंटन चैंपियनशिप के महिला एकल एसएल-3 फाइनल में हमवतन पारुल परमार को 21-12, 21-7 से हराकर खिताब जीता। मानसी ने 2011 में एक दुर्घटना में अपना बायां पैर गंवाया था और उसके आठ साल बाद फाइनल में उन्होंने तीन बार की विश्व चैंपियन परमार को शनिवार को पराजित किया। ।

मानसी जोशी के बीडब्ल्यूएफ पैरा बैडमिंटन चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतने के बाद हर तरफ इनके हौसले की चर्चा हो रही है। लेकिन मानसी  जोशी के इस सफलता के पीछे, काफी दर्द भी है, उनके संघर्ष और हौसले की कहानी जानकर आपकी आंखो में आंसू आ जाएंगे। मानसी जोशी महाराष्ट्र की रहने वाली हैं, और बचपन से ही इनकी दिलचस्पी बैडमिंटन के खेल में थी। साल 2011 में एक सड़क दुर्घटना में उन्होंने अपना एक पैर खो दिया। लेकिन उन्होंने ज़िंदगी से हार नहीं मानी और आज अपनी मेहनत और जज़्बे के दम पर एक नई पहचान हासिल की है। मानसी जोशी की उम्र अभी 30 साल है, और उन्होंने 9 साल की उम्र से ही बैडमिंटन खेलना शुरू कर दिया था। मानसी जोशी खुद भी इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की हुई हैं।

अपने सफ़र के बारे में उन्होंने Humans of Bomaby को बताया, जो आप पढ़ सकते हैं-

उस वक्त मैं अपने टू-व्हीलर से अपने ऑफिस जा रही थी, जब एक ट्रक ने मुझे टक्कर मारी और मेरे पाँव को बुरी तरह कुचल दिया। इसमें ड्राईवर की गलती नहीं थी – वहां एक पिलर था जिस से वह आगे देख नहीं पाया। वहां मौजूद लोगो ने मुझे फ़ौरन अस्पताल पहुँचाया जहाँ मेरा ऑपरेशन 5:30 बजे किया गया जबकि यह दुर्घटना लगभग 9:30 बजे हुई थी। डॉक्टर ने मेरे पाँव को बचाने की पूरी कोशिश की पर कुछ दिनों बाद ही उसमे इन्फेक्शन हो गया और उसे काटना पड़ा। जब डॉक्टर ने मुझे बताया तब मैंने उनसे कहा, “आपने इतनी देर लगायी ही क्यों। मुझे पहले से पता था की ये होना है।

इस पूरी परीक्षा से निकलने में जिस चीज़ ने मेरी मदद की वह थी – स्वीकृति- कि यह मेरी नियती है, और अब यह मुझे चुनना है कि इस पर रोऊँ, या इसे एक चुनौती की तरह स्वीकार करके आगे बढूँ। मैंने दूसरा विकल्प चुना। जब लोग मुझे मिलने अस्पताल आते थे और मेरी हालत देखकर रोने लगते थे, तब मैं ही उन्हें कोई चुटकुला सुना कर हंसाया करती थी!

फिर मैंने फिजियोथेरेपी ली, और एक बार फिर से चलना सीखा। मेरा सबसे बड़ा डर था कि मैं बैडमिंटन नहीं खेल पाऊँगी जो बचपन से मेरा शौक रहा है – पर पता नहीं कैसे मैं उस समय भी खेल पा रही थी, जब मुझे चलने में भी कठिनाई हो रही थी। मैंने कॉर्पोरेट बैडमिंटन टूर्नामेंट जीतना शुरू किया और अपने एक दोस्त की सलाह पर नेशनल लेवेल पर खेला। मैंने नेशनल स्तर पर कई पदक जीते और इस साल इंग्लैंड में हुए पैरा बैडमिंटन वर्ल्ड चैंपियनशिप मे रजत पदक जीता। मैं दिन में 5 घंटे की ट्रेनिंग लेती हूँ, अपने सॉफ्टवेयर इंजीनियर के जॉब में रहते हुए, स्कूबा डाइविंग में ट्रेनिंग लगभग पूरी कर चुकी हूँ और लगभग पूरा भारत घूम चुकी हूँ। जब लोग मुझसे पूछते हैं, ” आप इतना कुछ कैसे कर लेती हैं?” मैं उनसे बस एक सवाल करती हूँ ।