रायपुर। पिछली सरकार के कार्यकाल में लंबे आंदोलन और तमाम अर्जियां-ज्ञापन सौंपने के बावजूद अब तक नियमित नहीं हो सके अनियमित कर्मचारी अब भी तरह-तरह की तरकीबें अपनाकर अपनी बातें सरकार तक पहुंचाने की कोशिश में लगे हुए हैं। इसी कड़ी में एक अनियमित कर्मचारी टिकेश्‍वर देशमुख ने छत्‍तीसगढ़ी में एक कविता की रचना की है। इस कविता में उन्‍होंने न केवल अपनी व्‍यथा कही है, बल्कि नियमित करने का आग्रह भी सरकार से किया है। यह कविता बेहद तेजी के साथ पूरे छत्‍तीसगढ़ में वायरल हो रही है। पेश है वह कविता -

 अनिइमित करमचारी आन ! 



 

अनिइमित करमचारी आन !

छ. ग. के वासी आन।

खेती नइ करके नौकर होगेन

सरकारी करमचारी होगेन

दिन रात गिरत हपटत मन

पेट खातिर जियत मरत हन

कतेक पीरा ल घलो घोरियान

अनिइमित करमचारी आन। छ. ग. के वासी आन।

साहब कईथे निकाल देहूं

अईसे म कईसे काम करन

मन मार-मार के काम करवाथे

बाबू साहब मनके जेब भराथे।

कतेक दुख ल करबे बखान

अनिइमित करमचारी आन।

छ. ग. के वासी आन।

कतको कमाबे बखत म पैसा नइ रहाय

तभो ले बाबू साहेब मन ल लाज नी आय

भितरी भितरी जरत रहिथे

किसम किसम के नखरा करथे।

कतेक ल गोठियांव सियान

अनिइमित करमचारी आन।

छ. ग. के वासी आन।

ऐन बखत म रिनिवल नई करे।

कई महीना त तंखा नई डरे।

अपन मन पारटी करे त

हमन टुकुर टुकुर देखत रहान

कइसे अपन मन ल मढ़ान।

अनिइमित करमचारी आन।

छ. ग. के वासी आन।

नवा सरकार ले आशा रिहिस

चुनई से पहिली हमर पाछू रिहिस

अब छटनी होही कईथे त जी धुकधुकाथे

नोनी के दाई तको थरथराथे

ले देके जीनगी ल चलात हान

अनियमित करमचारी आन।

छ. ग. के वासी आन!

मोर पीरा ला कोन समझही

तपत भर ले एहू हा तपही

ऐ दरी गदगद ले जिताय रेहेन

अपन वादा ल निभाय रेहेन।

कहूं अपन वादा ल नई निभाही

यहू मन 12 के भाव म जाही

हमर का जाही हमन तो

अनियमित करमचारी आन

छ. ग. के वासी आन।

अतेक अतियाचार मत करव

गरीब मन के हाय मत लेवव

कहूं दिन कोई बिफर जाही

पानी बुड़े घलो कोई नी बचाही

निइमित होयके रहिबो जान।

अनिइमित करमचारी आन!  छ. ग. के वासी आन।

अतेक कमजोर मत जान

डेढ़ लाख के हावन पार

ऐकरे सेती चेतावत हन श्रीमान

निइमित करके रख लेव मान।

नहीं त ये बार नइ जितान

अनिइमित करमचारी आन!

छ. ग. के वासी आन।

जम्मो अनिइमित करमचारी छ. ग. शासन