इंदौर। बास्केटबॉल कॉम्प्लेक्स में सोमवार को मुमुक्षु सिमरन जैन का दीक्षा महोत्सव हुआ। दीक्षा के बाद मुमुक्षु 22 साल की सिमरन साध्वी गौतमी श्रीजी मसा बनीं। श्री वर्धमान श्वेतांबर स्थानकवासी जैन श्रावक संघ ट्रस्ट के तत्वावधान में दीक्षा महोत्सव हुआ। सुबह करीब 8.30 बजे महावीर भवन से वर्षी दान वरघोड़ा निकला, जिसमें मुमुक्षु सिमरन बग्घी पर सवार होकर सांसारिक वस्तुएं लुटाते हुए चल रही थीं। इसके पहले रविवार को सिमरन ने हाथों पर मेंहदी रचाई और परिजनों के साथ वक्त बिताया। उन्होंने इच्छानुसार अंतिम बार मनपसंद खाना खाया।

सिमरन ने कहा- वैराग्य की राह आसान नहीं है

उन्होंने दीक्षा को लेकर कहा - वैराग्य की राह आसान नहीं है, यह बहुत मुस्किल डगर है। मैं देशभर में घूमी। बहुत से खूबसूरत स्थानों पर गई। वहां वक्त भी बिताया, लेकिन सुकून नहीं मिला। जब मैं गुरुजनों के सानिध्य में आई तब जाकर सुकून की प्राप्ति हुई। मुझे चकाचौंथ भरी यह लाइफ रास नहीं आई। यहां आवश्यकता से अधिक लोग इस्तेमाल करते हैं, जो उचित नहीं। हमारे संत कम से कम संसाधन में जीवन व्यतीत करते हैं। अधिक से अधिक पाने की बजाय आत्मा का परमात्मा से जुड़ना ही असली सुख है। मुझे साध्वी डॉ. मुक्ताश्रीजी से संयम की प्रेरणा मिली।

ऐसी है सिमरन की फैमिली

सिमरन ने B.sc कम्प्यूटर साइंस से ग्रेजुएशन किया है। घर में माता-पिता, एक बहन और दो भाई हैं। बहन मेडिकल की पढ़ाई कर रही है। दीक्षा के बाद सिमरन के पिता अशोक गौड़ ने कहा- हमारी तरफ से बेटियो को अपनी इच्छा के अनुरूप जीवन जीने की अनुमति है। हमने सोचा था कि पढ़ने-लिखने के बाद करियर बनाएंगे या शादी करेंगे, लेकिन सिमरन की इच्छा दीक्षा लेने की ही थी।