By प्रेमकुमार मणि

अभी अभी मनहूस खबर मिली कि मशहूर कथा लेखिका कृष्णा सोबती जी नहीं रहीं। हालांकि उनकी उम्र कम नहीं थी ( जन्म 18 फ़रवरी 1925 ) लेकिन वह ऐसी हस्ती थीं ,जिनके बारे में इच्छा होती रही कि वह अमर होतीं। लेकिन अमर तो कोई होता नहीं। भीगे मन से उन्हें विदाई का प्रणाम देना ही होगा।
उनसे कई बार गोष्ठियों में मिलना हुआ। 1994 में मुझे जब श्रीकांत वर्मा पुरस्कार दिया जा रहा था, तब वह कृपापूर्वक आयोजन में आई थीं। मिलते ही गर्मजोशी से हाथ मिलाया, बधाई दी और गले लगीं। उनके व्यक्तित्व में एक ममतामयी गरिमा थी, एक ऐसी ऊष्मा, जिसे कभी भूला नहीं जा सकता। आज उनके न रहने की खबर मिली तब वह दृश्य स्मृति-पटल पर छा गया; आँखों को नम होना ही था।
Krishna SobatiKrishna Sobati
कृष्णा जी भारतीय साहित्य की ऐसी हस्ती हैं जिन्हे पीढ़ियां याद रखेंगी। 1925 में भारत के उस हिस्से में जन्मीं, जो अब पाकिस्तान में है। उस दौर में एक स्त्री का स्वतंत्र व्यक्तित्व विकसित होना सहज नहीं था। कृष्णा जी ने इसे संभव किया। एक लेखक के रूप में वह स्थापित हुईं। डार से बिछुड़ी, मित्रो मरजानी, यारों के यार, सूरजमुखी अँधेरे के, ज़िंदगीनामा, ऐ लड़की जैसी अनेक किताबों की लेखिका कृष्णा जी का अपने ही तरह का साहित्यिक-व्यक्तित्व था। उनका अपना डिक्शन, अपनी शैली है, जिसकी नकल मुश्किल है। ज़िंदगीनामा के लिए उन्हें 1980 में साहित्य अकादेमी अवार्ड मिला। 1996 में साहित्य अकादेमी का फ़ेलोशिप दिया गया। 2017 में ज्ञानपीठ अवार्ड से नवाजी गयीं। लेकिन इन पुरस्कारों का कोई दबाव उनके व्यक्तित्व पर नहीं था। मैं जब भी मिला उनमे एक ममतामयी आत्मीयता देखी। एक सहजता, अपने ही किस्म की एक गरिमा, जिसकी व्याख्या मुश्किल है।



उनके प्रति श्रद्धाँजलि व्यक्त करना-लिखना मेरे लिए मुश्किल है। उदास मन से इतना ही बुदबुदा सकता हूँ कि भारत ने, खासकर हिंदी साहित्य ने अचानक अपनी सांस्कृतिक ऊंचाइयां खो दी है।

कृष्णा सोबती जी को आखिरी प्रणाम !

(प्रेम कुमार मणि ख्यात चिंतक एवं साहित्यकार हैं)