- दिवाकर मुक्तिबोध

छत्तीसगढ़ राज्य विधान सभा चुनाव के नतीजों के लिए अब कुछ ही दिन शेष हैं। मतदाताओं के रुझान को भाँपते हुए कांग्रेस का ख्याल है कि वह 15 वर्षों बाद सत्ता में वापसी कर रही है। इसलिए प्रदेश कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने अपने -अपने पत्ते खोलने शुरू कर दिए हैं। चूँकि उन्हें पूर्ण बहुमत मिलने का विश्वास है, लिहाजा अजीत जोगी के नेतृत्व वाली छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के सहयोग की उन्हें कोई जरूरत नहीं है। पार्टी नेताओं का मानना है कि कांग्रेस को कुल 90 मे से 50 से अधिक सीटें मिलेंगी। सरकार बनाने के लिए 46 सीटें चाहिए। बहुत संभव है कांग्रेस का अनुमान सही साबित हो लेकिन यदि ऐसा नहीं हुआ और दो - चार सीटें कम पड़ गई तो क्या होगा? क्या कर्नाटक का इतिहास दोहराया जाएगा जहाँ कांग्रेस की अधिक सीटें होते हुए भी मुख्यमंत्री उसका नहीं है? अजीत जोगी बार - बार कह रहे हैं कि सत्ता की चाबी उनके हाथ में होगी और वे ही मुख्यमंत्री बनेंगे। क्या वे हवा में उड़ रहे हैं या इस कथन के पीछे कोई तार्किक आधार है? जाहिर है, चुनाव के पूर्व या चुनाव के बाद ऐसे दावों का कोई ठोस आधार नहीं होता और प्रत्येक राजनीतिक पार्टी और उसके नेता ख्याली पुलाव पकाते रहते है। अजीत जोगी भी इससे अलग नहीं है।

लेकिन कांग्रेस के बड़े नेताओं को अजीत जोगी से बड़ी एलर्जी है। खासकर प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल व नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव को। खिलाफ बयान देने के मामले में सिंहदेव बघेल से दो कदम आगे हैं। जोगी की तीखी आलोचना करते हुए उन्होंने यहाँ तक कह दिया है कि जोगी की पार्टी से समर्थन लेने के बजाए वे राजनीति छोड़कर घर बैठना पसंद करेंगे। जब उन्हें अहसास हुआ कि वे कुछ ज्यादा ही कह गए हैं तो उन्होंने राजनेता एवं मुख्यमंत्री के रूप में जोगी के कार्यकाल की तारीफ करते हुए बयान दिया कि अब उनमें अब पहले जैसी क्षमता नहीं है। 26 नवंबर 2018 को उन्होंने रायपुर में मीडिया से चर्चा के दौरान कहा - 'जोगीजी काबिल थे इसलिए मुख्यमंत्री बने। उनके विवेक व इंटेलिजेंसी पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। जोगीजी की सरकार में मुझे वित्त आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था। मुझे उन्होंने यह मौका दिया। उसके बाद जोगीजी से संबंध बनते गए और बिगड़ते गए। भाजपा ने जोगीजी का जो सपोर्ट किया, वह सभी को मालूम है। इन्हीं मामलों में अंतागढ़ सीडी कांड सामने आया। इन मुद्दों पर मेरी ये राय है कि राजनीति में सब चलता है, को मैं नहीं मानता। समझौता आदमी सत्ता के लिए करता है, ये मेरा मानना नहीं है। जोगी जी के साथ मिलकर सरकार बनानी पड़ें तो इससे अच्छा है कि मैं अपने आप को इन सबसे बाहर रखूँ, घर बैठूँ।'

टीएस सिंहदेव का यह बयान समयानुकूल नहीं है। अभी इसकी जरूरत ही नहीं थी। नतीजे आए नहीं है लिहाजा उनके सामने काल्पनिक प्रश्नों का उत्तर देने की बाध्यता नहीं थी। क्या यह संभव नहीं कि कांग्रेस या भाजपा किसी को भी स्पष्ट बहुमत न मिले और ऐसी हालत में सरकार बनाने के लिए तीसरी या चौथी पार्टी से गठजोड़ आवश्यक हो जाए? यानी चुनाव नतीजे आने के बाद कैसी राजनीतिक परिस्थितियां बनेंगी, अभी क्या कहा जा सकता है? लेकिन टीएस सिंहदेव ने संयम न बरतते हुए समय से पहले अपने पत्ते खोलकर यह जाहिर कर दिया है कि जोगी के मामले में वे कितने सख्त हैं। इसे हम कुंठित मानसिकता भी कह सकते हैं। यह भी ठीक है कि ये उनके अपने विचार हैं और पार्टी का इससे कोई लेना देना नहीं है। क्योंकि कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व यह मानकर चल रहा है कि छत्तीसगढ़ का चुनाव वह जीत रही है। तथा उसे बाहरी सहयोग की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन पड़ गई तो क्या? ऐसी स्थिति में क्या सिंहदेव अपनी बात पर कायम रहेंगे? क्या घर बैठ जाएँगे?

दरअसल अजीत जोगी की तोड़फोड़ राजनीति से राज्य कांग्रेस के आला नेता इतने भयाक्रान्त है कि वे नहीं चाहते कि जोगी की पार्टी में वापसी हो या सरकार बनाने उनका समर्थन लिया जाए। लेकिन यदि ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई और छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस को कुछ सीटों पर सफलता मिल गई तो उसका समर्थन लेना कांग्रेस की मजबूरी हो जाएगी बशर्ते वह अब विपक्ष में बैठना कबूल न करे। टीएस सिंहदेव अपनी मान-मर्यादा की रक्षा के लिए भले ही घर बैठ जाएं पर केन्द्रीय नेतृत्व नहीं चाहेगा उसके कुछ प्रादेशिक नेताओं की अहम् की लड़ाई में पार्टी पुन: शहीद हो जाए। क्योंकि पन्द्रह वर्षों का वनवास कम नहीं होता। दूसरी महत्वपूर्ण बात है लोकसभा चुनाव पांच-छह महीनों बाद होना है। कांग्रेस का बड़ा लक्ष्य लोकसभा चुनाव है इसलिए यदि गठजोड़ से छत्तीसगढ़ की सत्ता हाथ में आ रही है तो वह उसे फिसलने नहीं देगी।

बहरहाल ये राजनीतिक अनुमान खरे भी हो सकते हैं अथवा धराशायी भी। राजनायिकों के साथ - साथ जनता की भी निगाहें अजीत जोगी पर टिकी हुई हैं। वे लगभग शून्य के घेरे में रहेंगे या दहाई आँकड़ों में, मतगणना के बाद स्पष्ट होगा? शून्य के आसपास रहे तो उनकी कहानी खत्म अन्यथा वे सौदेबाजी करेंगे। उन्होंने धर्म ग्रन्थों की शपथ लेकर कहा है कि वे मरना पसंद करेंगे, भाजपा के साथ जाना नहीं। पर इस पर कौन विश्वास करेगा? राजनीति में विश्वास दुर्लभ चीज़ हैं। राज और राजनीति पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के उस बयान को याद कर सकते हैं जो 'डान' में छपा है। हाल ही में इस अखबार को दिए गए इंटरव्यू में उन्होंने राय जाहिर की थी कि यू टर्न लेने में बुराई नहीं है। जो नेता हालातों को देखते हुए यू टर्न नहीं लेता वह बेवकूफ है। जाहिर है, भारतीय नेता ऐसी बेवकूफी नहीं करते हैं।