नयी दिल्ली। देशभर में आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं और देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की 115वीं जयंती मनाई जा रही है। लाल बहादुर शास्त्री एक सीधी, सरल, सच्ची और निर्मल छवि वाले इंसान थे. उनकी ईमानदारी और खुद्दारी की लोग आज भी मिसाल देते हैं। लाल बहादुर शास्त्री की जयंती पर हम आपको उनके जीवन की सरलता, ईमानदारी और सादगी से भरे कुछ अनकहे किस्से बता रहे हैं:-

- बनारस के हरिश्चंद्र इंटर कॉलेज में हाईस्कूल की पढ़ाई के दौरान उन्होंने साइंस प्रैक्टिकल में इस्तेमाल होने वाले बीकर को तोड़ दिया था. स्कूल के चपरासी देवीलाल ने उनको देख लिया और उन्‍हें जोरदार थप्पड़ मार दिया। रेल मंत्री बनने के बाद 1954 में एक कार्यक्रम में भाग लेने आए शास्त्री जब मंच पर थे, तो देवीलाल उनको देखते ही हट गए. शास्त्री ने भी उन्हें पहचान लिया और देवीलाल को मंच पर बुलाकर गले लगा लिया।

- जन्‍म से वर्मा लाल बहादुर शास्‍त्री जाति प्रथा के घोर विरोधी थे। इसलिए उन्‍होंने कभी भी अपने नाम के साथ अपना सरनेम नहीं लगाया। उनके नाम के साथ लगी 'शास्‍त्री' की उपाधि उन्‍हें काशी विद्यापीठ की तरफ से मिली थी।

- बनारस में पैदा हुए शास्‍त्री का स्‍कूल गंगा की दूसरी तरफ था. उनके पास गंगा नदी पार करने के लिए फेरी के पैसे नहीं होते थे। इसलिए वह दिन में दो बार अपनी किताबें सिर पर बांधकर तैरकर नदी पार करते थे और स्कूल जाते थे।

- कहा जाता है कि शास्त्री फटे कपड़ों से बाद में रुमाल बनवाते थे। फटे कुर्तों को कोट के नीचे पहनते थे। इस पर जब उनकी पत्नी ने उन्हें टोका, तो उनका कहना था कि देश में बहुत ऐसे लोग हैं, जो इसी तरह गुजारा करते हैं।

-लाल बहादुर शास्‍त्री, बापू को अपना आदर्श मानते थे. उन्‍हें खादी से इतना लगाव था कि अपनी शादी में दहेज के तौर पर उन्‍होंने खादी के कपड़े और चरखा लिया था।

-लाल बहादुर शास्‍त्री प्रधानमंत्री बनने से पहले विदेश मंत्री, गृह मंत्री और रेल मंत्री जैसे अहम पदों पर थे। एक बार वह रेल की एसी बोगी में सफर कर रहे थे। इस दौरान वह यात्रियों की समस्या जानने के लिए थर्ड क्लास (जनरल बोगी) में चले गए। वहां उन्होंने यात्रियों की दिक्कतों को देखा। उन्‍होंने जनरल बोगी में सफर करने वाले यात्रियों के लिए पंखा लगवा दिया। पैंट्री की सुविधा भी शुरू करवाई।

-शास्‍त्री सादा जीवन में विश्‍वास रखते थे. प्रधानमंत्री होने के बावजूद उन्‍होंने अपने बेटे के कॉलेज एडमिशन फॉर्म में अपने आपको प्रधानमंत्री न लिखकर सरकारी कर्मचारी लिखा। उन्‍होंने कभी अपने पद का इस्तेमाल परिवार के लाभ के लिए नहीं किया।

-उनके बेटे ने एक आम इंसान के बेटे की तरह रोजगार के लिए खुद को रजिस्‍टर करवाया था। एक बार जब उनके बेटे को गलत तरह से प्रमोशन दे दिया गया, तो शास्‍त्री जी ने खुद उस प्रमोशन को रद्द करवा दिया।

-लाल बहादुर शास्त्री इतने र्इमानदार थे कि उन्‍होंने कभी भी प्रधानमंत्री के तौर पर उन्‍हें मिली हुई गाड़ी का निजी काम के लिए इस्‍तेमाल नहीं किया।

- शास्त्री किसी भी प्रोग्राम में वीवीआईपी की तरह नहीं, बल्कि एक आम इंसान की तरह जाना पसंद करते थे। प्रोग्राम में उनके लिए तरह-तरह के पकवानों का इंतजाम किया जाता था। लेकिन, शास्त्री कभी नहीं खाते थे। उनका कहना था कि गरीब आदमी भूखा सोया होगा और मै मंत्री होकर पकवान खाऊं, ये अच्छा नहीं लगता। दोपहर के खाने में वे अक्सर सब्जी-रोटी खाते थे।

-शास्त्री ने युद्ध के दौरान देशवासियों से अपील की थी कि अन्न संकट से उबरने के लिए सभी देशवासी सप्ताह में एक दिन का व्रत रखें. उनके अपील पर देशवासियों ने सोमवार को व्रत रखना शुरू कर दिया था।

-प्रधानमंत्री बनने के बाद शास्त्री पहली बार काशी अपने घर आ रहे थे। उनके घर तक जाने वाली गलियां काफी संकरी थीं, जिस कारण उनकी गाड़ी वहां तक नहीं पहुंच पाती. ऐसे में पुलिस-प्रशासन ने गलियों को चौड़ा करने का फैसला किया। यह बात शास्त्री को मालूम हुई, तो उन्होंने आदेश दिया कि गलियों को चौड़ा करने के लिए किसी भी मकान को तोड़ा न जाए. वह पैदल ही घर जाएंगे।